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NepalJudiciary – नेपाल में चीफ जस्टिस नियुक्ति पर सरकार और अदालत में छिड़ा टकराव

NepalJudiciary – नेपाल में मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच तनाव गहरा गया है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की अध्यक्षता वाली संवैधानिक परिषद द्वारा न्यायमूर्ति मनोज कुमार शर्मा के नाम की सिफारिश के बाद विवाद ने राजनीतिक और संवैधानिक रूप ले लिया है। न्यायपालिका के भीतर भी इस फैसले को लेकर असहमति सामने आ रही है।

nepaljudiciary chief justice appointment row

संवैधानिक परिषद ने 7 मई को राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल को न्यायमूर्ति मनोज शर्मा को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश भेजी थी। विवाद की मुख्य वजह यह है कि वरिष्ठता क्रम में शर्मा चौथे स्थान पर हैं। ऐसे में वरिष्ठ न्यायाधीशों को दरकिनार कर उनकी सिफारिश किए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

अदालत में याचिका को लेकर बढ़ा विवाद

मामला उस समय और गंभीर हो गया जब कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ला ने इस नियुक्ति को चुनौती देने वाली रिट याचिका को तत्काल दर्ज करने का आदेश दिया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय प्रशासन को लिखित निर्देश जारी कर दोपहर तक याचिका पंजीकृत करने को कहा था।

हालांकि प्रशासनिक स्तर पर आदेश का पालन नहीं हो सका। बताया गया कि मुख्य रजिस्ट्रार और अन्य संबंधित अधिकारियों से संपर्क नहीं हो पाया, जिसके कारण निर्धारित समय में प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी। इस घटनाक्रम ने न्यायपालिका के भीतर प्रशासनिक मतभेदों को भी उजागर कर दिया है।

याचिकाकर्ताओं ने उठाए संवैधानिक सवाल

वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी और अधिवक्ता प्रेम राज सिलवाल सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने नियुक्ति प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी है। उनका कहना है कि वरिष्ठता की परंपरा को नजरअंदाज कर संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन किया गया है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह फैसला न्यायिक आचरण से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों और नागरिक अधिकारों से संबंधित प्रावधानों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मुख्य न्यायाधीश जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए।

पहले अदालत प्रशासन ने याचिका दर्ज करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद शिकायतकर्ताओं ने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात की, जिसके बाद याचिका स्वीकार करने का निर्देश जारी किया गया।

संसद में भी छिड़ी बहस

इस मुद्दे की गूंज नेपाल की संसद में भी सुनाई दी। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सांसदों ने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के आदेश पर सवाल उठाए। सांसद समीक्षा बस्तोला ने कहा कि सत्ता के तीनों अंगों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है और किसी भी संस्था को अपनी सीमाएं नहीं लांघनी चाहिए।

वहीं सांसद यज्ञ मणि नेउपाने ने कहा कि न्यायपालिका स्वतंत्र है, लेकिन प्रशासनिक फैसलों पर संसद चर्चा कर सकती है। दूसरी ओर सीपीएन-यूएमएल के सांसदों ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि अदालत में लंबित मामलों पर संसद में चर्चा नियमों के खिलाफ है।

संविधान और शिकायतों पर बढ़ा ध्यान

नेपाल के संविधान का अनुच्छेद 105 स्पष्ट करता है कि न्यायालय में लंबित मामलों पर संसद में ऐसी चर्चा नहीं हो सकती जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो। इसी संवैधानिक प्रावधान को लेकर अब अलग-अलग पक्ष अपनी दलीलें दे रहे हैं।

उधर संसदीय सुनवाई समिति के पास प्रस्तावित मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार शर्मा के खिलाफ अब तक 16 शिकायतें पहुंच चुकी हैं। समिति इन शिकायतों पर सुनवाई शुरू करने जा रही है। काठमांडू की एक याचिकाकर्ता ने उनकी नियुक्ति रद्द करने और आवश्यकता पड़ने पर महाभियोग प्रक्रिया शुरू करने की मांग भी उठाई है।

विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले दिनों में नेपाल की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। फिलहाल सरकार, संसद और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती सबसे बड़ी बनी हुई है।

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