BombayHighCourt – पत्नी को नौकरानी मानना गलत, अदालत ने की सख्त टिप्पणी
BombayHighCourt – बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक तलाक मामले की सुनवाई के दौरान विवाह और घरेलू जिम्मेदारियों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि केवल घरेलू कामकाज ठीक से न कर पाने को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह समान भागीदारी का संबंध है, न कि ऐसा समझौता जिसमें पत्नी से घरेलू कर्मचारी की तरह व्यवहार किया जाए।

फैमिली कोर्ट का पुराना फैसला रद्द
यह मामला एक दंपति से जुड़ा है जिनकी शादी वर्ष 2002 में हुई थी। कुछ समय बाद दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया और पति ने तलाक की अर्जी दाखिल कर दी। पति, जो पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट बताया गया है, ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी घर के काम नहीं करती, खाना बनाना नहीं जानती और परिवार के सदस्यों के साथ सहयोग नहीं करती थी। उसने इन बातों को मानसिक तनाव और वैवाहिक क्रूरता का आधार बताया था।
बांद्रा फैमिली कोर्ट ने वर्ष 2009 में पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तलाक की अनुमति दे दी थी। साथ ही पत्नी को गुजारा भत्ता देने से भी छूट दे दी गई थी। अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने उस फैसले को पलटते हुए नए निर्देश जारी किए हैं।
पत्नी ने लगाए थे प्रताड़ना के आरोप
सुनवाई के दौरान पत्नी ने पति के आरोपों को गलत बताया। उसने अदालत को बताया कि ससुराल में उससे घरेलू नौकरानी की तरह काम कराया जाता था। महिला का कहना था कि उसे लगातार कपड़े और बर्तन धोने जैसे काम करने पड़ते थे और कई बार बचा हुआ खाना खाने के लिए मजबूर किया जाता था।
महिला ने यह भी कहा कि घरेलू माहौल उसके लिए मानसिक रूप से परेशान करने वाला बन गया था, जिसके बाद उसने अलग रहने का फैसला लिया। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले का पुनर्मूल्यांकन किया।
हाईकोर्ट ने विवाह को बताया समान संबंध
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि घरेलू कामकाज को लेकर पति-पत्नी के बीच होने वाले सामान्य मतभेदों को क्रूरता नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि विवाह किसी सेवा अनुबंध की तरह नहीं है, जहां काम पूरा न करने पर संबंध खत्म कर दिया जाए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि समाज में अब भी कई जगह महिलाओं से केवल घरेलू जिम्मेदारियां निभाने की अपेक्षा की जाती है, जबकि विवाह दोनों पक्षों की साझा जिम्मेदारी है। अदालत के अनुसार, हर वैवाहिक संबंध में शुरुआती दौर में समायोजन की प्रक्रिया होती है और उसे कानूनी क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
गुजारा भत्ता देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने पति को पत्नी को मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश भी दिया। अदालत ने कहा कि केवल किसी विज्ञापन या अस्थायी गतिविधि के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि महिला आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि पति हर महीने 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता और 10 हजार रुपये अलग से आवास खर्च के रूप में देगा। अदालत ने कहा कि आर्थिक सहायता तय करते समय महिला की वास्तविक आय और जीवनयापन की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।
फैसले को माना जा रहा अहम
कानूनी विशेषज्ञ इस फैसले को वैवाहिक अधिकारों और महिलाओं की गरिमा से जुड़ा महत्वपूर्ण निर्णय मान रहे हैं। अदालत की टिप्पणियों को उन मामलों के संदर्भ में भी अहम माना जा रहा है, जहां घरेलू कामकाज को लेकर वैवाहिक विवाद अदालत तक पहुंच जाते हैं।
फिलहाल यह फैसला सामाजिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है।