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MedicinePrices – पश्चिम एशिया संकट के बीच दवाओं की कीमत बढ़ने के दिखे संकेत

MedicinePrices – पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब भारतीय बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। केंद्र सरकार आवश्यक और जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों में सीमित अवधि के लिए बढ़ोतरी करने पर विचार कर रही है। सूत्रों के अनुसार, यह फैसला दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और रसायनों की बढ़ती लागत को देखते हुए लिया जा सकता है। सरकार और दवा उद्योग से जुड़े विभागों के बीच इस विषय पर लगातार चर्चा चल रही है।

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जानकारी के मुताबिक, जिन दवाओं की कीमतों में बदलाव पर विचार हो रहा है, उनमें रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कई महत्वपूर्ण दवाएं शामिल हैं। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि यह बढ़ोतरी स्थायी नहीं होगी और अंतरराष्ट्रीय हालात सामान्य होने के बाद कीमतों की समीक्षा की जाएगी।

कच्चे माल की लागत में बड़ा उछाल

दवा उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट के कारण कई जरूरी रसायनों और फार्मा कच्चे माल की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है। कुछ मामलों में लागत 200 से 300 प्रतिशत तक बढ़ने की बात सामने आई है। इसके अलावा पैकेजिंग सामग्री और परिवहन खर्च भी बढ़ गए हैं, जिसका सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ रहा है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण, फार्मास्यूटिकल्स विभाग और वाणिज्य मंत्रालय इस स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं। उद्देश्य यह है कि दवाओं की उपलब्धता बनी रहे और कंपनियों पर अत्यधिक आर्थिक दबाव भी न पड़े।

कई जरूरी दवाएं हो सकती हैं प्रभावित

प्रस्तावित सूची में एंटीबायोटिक, हृदय रोग, दर्द निवारक और विटामिन से जुड़ी दवाएं शामिल बताई जा रही हैं। इनमें एमॉक्सिसिलिन, एजिथ्रोमाइसिन, पैरासिटामोल, एटोरवास्टेटिन और डेक्सामेथासोन जैसी दवाओं का नाम सामने आया है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इन दवाओं का इस्तेमाल बड़ी संख्या में मरीज करते हैं, इसलिए सरकार कीमतों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है। अधिकारियों का दावा है कि किसी भी निर्णय में मरीजों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी।

ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का भी असर

हाल के दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है, जिसका असर परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत पर पड़ा है। राजधानी दिल्ली समेत कई शहरों में ईंधन दरों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उद्योग जगत का कहना है कि इससे दवा आपूर्ति श्रृंखला की लागत भी बढ़ रही है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का असर सिर्फ दवा उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि खाद्य, परिवहन और अन्य जरूरी सेवाओं पर भी पड़ सकता है। इसी कारण सरकार विभिन्न क्षेत्रों की लागत स्थिति पर नजर बनाए हुए है।

विदेशी मुद्रा और आयात पर बढ़ा दबाव

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल आपूर्ति और परिवहन मार्ग प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार और आयात बिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल में संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर जोर दिया था। सरकार ऊर्जा खपत को नियंत्रित करने और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बनाए रखने के लिए विभिन्न विकल्पों पर काम कर रही है।

सरकार ने पर्याप्त भंडार होने का भरोसा दिया

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा है कि देश में फिलहाल कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल और एलपीजी का पर्याप्त भंडार मौजूद है। सरकार का कहना है कि आपूर्ति व्यवस्था को सामान्य बनाए रखने के लिए लगातार निगरानी की जा रही है।

अधिकारियों के मुताबिक, एलपीजी की घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के कदम भी उठाए गए हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में आम लोगों को परेशानी न हो। सरकार का कहना है कि मौजूदा हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त कदम उठाए जाएंगे।

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