CasteCensus – जातिगत जनगणना की प्रक्रिया तय करने पर सरकार के सामने कई विकल्प
CasteCensus– आगामी राष्ट्रीय जनगणना की तैयारियों के बीच केंद्र सरकार जातिगत आंकड़ों के संग्रह की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में जुटी है। आबादी की गणना शुरू होने में अब करीब छह महीने का समय शेष है और इसी को देखते हुए भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त (RGI) का कार्यालय विभिन्न विकल्पों पर विस्तार से विचार कर रहा है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जाति संबंधी जानकारी किस तरीके से दर्ज की जाए ताकि आंकड़े विश्वसनीय भी रहें और प्रशासनिक स्तर पर उनका उपयोग भी संभव हो सके।

दो संभावित तरीकों पर चल रहा विचार
सूत्रों के अनुसार, फिलहाल दो प्रमुख मॉडल पर चर्चा हो रही है। पहले मॉडल में लोगों को अपनी जाति स्वयं लिखने की स्वतंत्रता देने का प्रस्ताव है। वहीं दूसरे मॉडल में पहले से अधिसूचित और मान्यता प्राप्त जातियों की सूची के आधार पर डिजिटल ड्रॉप-डाउन विकल्प उपलब्ध कराने पर विचार किया जा रहा है। अधिकारियों का मानना है कि दोनों प्रणालियों के अपने-अपने लाभ और व्यावहारिक चुनौतियां हैं, इसलिए अंतिम निर्णय से पहले सभी पहलुओं का मूल्यांकन किया जा रहा है।
2011 के अनुभव से मिल रही सीख
सरकारी स्तर पर वर्ष 2011 की सामाजिक, आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) के अनुभवों को भी ध्यान में रखा जा रहा है। उस समय लोगों को अपनी जाति स्वयं दर्ज करने की अनुमति दी गई थी, लेकिन अलग-अलग वर्तनी, स्थानीय नामों और क्षेत्रीय पहचान के कारण बड़ी संख्या में असंगत प्रविष्टियां सामने आईं। परिणामस्वरूप तैयार हुआ डेटा अपेक्षित स्तर का नहीं माना गया और उससे एक प्रमाणिक जातिगत डेटाबेस तैयार करना संभव नहीं हो सका।
आंकड़ों की गुणवत्ता बनी प्रमुख चिंता
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1931 की व्यापक जाति जनगणना में करीब 4,147 जातियों का रिकॉर्ड दर्ज हुआ था। इसके विपरीत, 2011 की प्रक्रिया के दौरान सत्यापन की कमी और अलग-अलग नामों के कारण लाखों भिन्न प्रविष्टियां सामने आईं। अधिकारियों का मानना है कि भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर अधिक सटीक व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है। सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इस संवेदनशील विषय पर किसी भी प्रकार की प्रक्रिया संबंधी त्रुटि व्यापक विवाद का कारण बन सकती है।
ड्रॉप-डाउन मॉडल पर भी जारी है चर्चा
दूसरे विकल्प के तहत केंद्र और राज्य सरकारों की मान्यता प्राप्त जातियों की सूची को एकीकृत कर डिजिटल ड्रॉप-डाउन प्रणाली विकसित करने का सुझाव सामने आया है। वर्तमान में जनगणना प्रणाली में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए निर्धारित विकल्प उपलब्ध हैं, जबकि अन्य श्रेणियों के लिए अलग व्यवस्था नहीं है। प्रस्तावित मॉडल में अन्य मान्यता प्राप्त जातियों को भी डिजिटल सूची के माध्यम से दर्ज करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।
आरएसएस ने जताई आपत्ति, सरकार कर रही समीक्षा
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस प्रस्तावित व्यवस्था पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने आपत्ति दर्ज कराई है। संघ का मत है कि मौजूदा जातिगत वर्गीकरण का एक बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक काल की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा रहा है और उसी आधार पर नई व्यवस्था तैयार करना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि जातिगत जनगणना कराने का निर्णय स्पष्ट है, लेकिन इसकी प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो व्यावहारिक, पारदर्शी और विश्वसनीय हो। इसी उद्देश्य से विभिन्न सुझावों और तकनीकी विकल्पों का परीक्षण जारी है, ताकि अंतिम प्रणाली व्यापक स्तर पर प्रभावी साबित हो सके।