LandslideRisk – नए अध्ययन में हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते भूस्खलन पर बढ़ी चिंता
LandslideRisk- उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाओं का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। दून विश्वविद्यालय और आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों के संयुक्त अध्ययन में सामने आया है कि अब पहाड़ों में बड़े भूकंप के बिना भी भूस्खलन की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि बदलता मौसम, अनियोजित निर्माण और बढ़ता पर्यटन दबाव पर्वतीय क्षेत्रों की भूगर्भीय स्थिरता को प्रभावित कर रहा है, जिससे भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है।

पहले भूकंप के बाद बढ़ते थे भूस्खलन
अध्ययन के अनुसार वर्ष 2010 से पहले बड़े भूकंपों के बाद लंबे समय तक भूस्खलन की घटनाएं अधिक देखने को मिलती थीं। इसमें 1991 का उत्तरकाशी भूकंप और 1999 का चमोली भूकंप प्रमुख उदाहरण रहे हैं। इन दोनों भूकंपों के बाद भागीरथी-यमुना और अलकनंदा-मंदाकिनी घाटियों में भूगर्भीय अस्थिरता बनी रही, जिसके कारण लंबे समय तक पहाड़ों में दरारें और भूस्खलन की घटनाएं होती रहीं।
बिना भूकंप भी बढ़ रहे हैं खतरे
शोध में यह निष्कर्ष सामने आया कि पिछले डेढ़ दशक में स्थिति बदल गई है। अब बड़े भूकंप की अनुपस्थिति में भी पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाओं में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। दून विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. विपिन कुमार के अनुसार, वर्षा के बदलते पैटर्न, सड़कों और अन्य निर्माण कार्यों का विस्तार तथा पर्यटन गतिविधियों का बढ़ता दबाव हिमालयी ढलानों को कमजोर बना रहा है। उनका कहना है कि यदि इन कारकों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में केदारनाथ जैसी बड़ी आपदाओं का खतरा और बढ़ सकता है।
नदी घाटियों में तेजी से बढ़ रहा प्रभावित क्षेत्र
अध्ययन में चारधाम मार्ग से जुड़ी प्रमुख नदी घाटियों का भी विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार इन क्षेत्रों में भूस्खलन से प्रभावित भूमि का दायरा हर वर्ष औसतन 1.82 वर्ग किलोमीटर की दर से बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह संकेत है कि हिमालयी क्षेत्र धीरे-धीरे अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं और प्राकृतिक संतुलन पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
शोध में दिए गए महत्वपूर्ण सुझाव
वैज्ञानिकों ने संवेदनशील क्षेत्रों में विकास कार्यों को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी भी बड़ी परियोजना को मंजूरी देने से पहले विस्तृत और दीर्घकालिक आपदा जोखिम मूल्यांकन किया जाना चाहिए। इसके अलावा अत्यधिक संवेदनशील नदी घाटियों में अनियंत्रित बसावट और पलायन आधारित दबाव को कम करने के उपाय भी जरूरी बताए गए हैं, ताकि भविष्य में जोखिम को कम किया जा सके।
आंकड़ों में दिखा भूस्खलन का बढ़ता दायरा
शोध के आंकड़े भी इस बदलाव की पुष्टि करते हैं। अलकनंदा-मंदाकिनी घाटी में वर्ष 1995 से 2010 के बीच 3,742 भूस्खलन दर्ज किए गए थे, जबकि 2010 के बाद यह संख्या बढ़कर 5,759 हो गई। इसी तरह भागीरथी-यमुना घाटी में 2010 से पहले 15 वर्षों के दौरान 1,461 भूस्खलन की घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि इसके बाद के 15 वर्षों में यह आंकड़ा बढ़कर 2,890 तक पहुंच गया। विशेषज्ञों के अनुसार ये आंकड़े हिमालयी क्षेत्रों में बदलते भूगर्भीय और पर्यावरणीय हालात की ओर स्पष्ट संकेत देते हैं।