Premanand Maharaj Satsang: भ्रम का वह पर्दा जिसने आपसे छुपा रखा है सच, प्रेमानंद महाराज ने खोली माया की गुप्त गुत्थी
Premanand Maharaj Satsang: अध्यात्म की दुनिया में ‘माया’ एक ऐसा शब्द है जिसने सदियों से जिज्ञासुओं को उलझाए रखा है। हाल ही में एक भक्त ने परम पूज्य प्रेमानंद महाराज से यह प्रश्न पूछा कि आखिर माया क्या है और इसका इस संसार में उद्देश्य क्या है। महाराज जी ने बड़ी ही सरलता से गूढ़ रहस्य समझाते हुए (Spiritual Wisdom) का द्वार खोला। उन्होंने बताया कि ब्रह्म को ढक देना और एक अखंड सत्य की जगह अनेकता का दर्शन कराना ही माया का प्राथमिक कार्य है।

ब्रह्म और जगत का अंतर: क्यों नहीं हो पाता सत्य का अनुभव?
वेदों का उद्धरण देते हुए महाराज जी कहते हैं कि इस चराचर जगत में ब्रह्म के सिवा रत्ती भर भी कुछ और मौजूद नहीं है। लेकिन माया का प्रभाव इतना प्रबल है कि वह हमें (Divine Consciousness) का अनुभव नहीं होने देती। माया का मुख्य उद्देश्य ही यही है कि वह सत्य को ओझल कर दे और हमें उस ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं की प्रतीति कराए, जिससे हम भ्रम के जाल में फंसे रहें।
इंद्रियों का मायाजाल: स्त्री, पुरुष और धन के पीछे का सच
महाराज जी विस्तार से बताते हैं कि सर्वत्र व्याप्त ब्रह्म को आच्छादित करके यह माया हमें स्त्री, पुरुष, धन, सुख, लाभ और हानि जैसी सांसारिक चीजों का अनुभव कराती है। इस (Mundane Existence) के चक्रव्यूह में फंसकर जीव कभी उस परम सत्ता का साक्षात्कार नहीं कर पाता। माया एक ऐसा पर्दा है जो हमें दिखाती तो सब कुछ है, लेकिन उस एक को छुपा लेती है जो सबका आधार है।
गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई: माया की परिभाषा और विस्तार
माया के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए महाराज जी रामचरितमानस की चौपाई का सहारा लेते हैं। वे कहते हैं कि ‘मैं और मेरा, तू और तेरा’ का भाव ही माया है, जिसने समस्त जीव समुदाय को अपने वश में कर रखा है। जहां तक (Human Senses) और मन की गति जाती है, वह सब कुछ माया का ही विस्तार है। तिनके से लेकर ब्रह्म लोक तक जो कुछ भी दृश्यमान है, वह सब इसी माया की रचना है।
सत्य की एकमात्र कसौटी: केवल हरि नाम ही शाश्वत है
इस संसार में जो कुछ भी हम देख रहे हैं, वह परिवर्तनशील और नश्वर है। महाराज जी के अनुसार, यदि इस सृष्टि में कुछ सत्य है, तो वह केवल हरि और उनका नाम ब्रह्म है। इसके अतिरिक्त (Ultimate Truth) अन्यत्र कहीं नहीं है। माया का कार्य ही यही है कि वह जीव को भगवान से विमुख करके संसार के विस्तार में उलझाए रखे, ताकि वह सत्य तक न पहुंच सके।
साधना की शक्ति: जब छंट जाता है भ्रम का कोहरा
जब एक साधक निरंतर भक्ति और आराधना के पथ पर चलता है, तो धीरे-धीरे माया का प्रभाव क्षीण होने लगता है। महाराज जी कहते हैं कि (Sadhana Practice) जब परिपक्व अवस्था में पहुंचती है, तब यह द्वैत भाव खत्म हो जाता है। जैसे-जैसे मन शुद्ध होता है, साधक को हर कण में भगवान की उपस्थिति महसूस होने लगती है और माया का पर्दा स्वतः ही गिर जाता है।
सियाराम मय जग जानी: तुलसीदास जी का दिव्य अनुभव
भक्ति की पराकाष्ठा का उदाहरण देते हुए महाराज जी ने गोस्वामी तुलसीदास जी का जिक्र किया। जब उनकी साधना पूर्ण हुई, तब वे जड़-चेतन, जीव-जगत, सबमें केवल श्री राम का ही दर्शन करने लगे। उनके लिए (Spiritual Enlightenment) का अर्थ ही यही था कि अब माया का भ्रम पूरी तरह समाप्त हो चुका है। सर्वत्र सियाराम विराजमान हैं और पृथकता का बोध सदा के लिए मिट गया है।
माया पर विजय का मार्ग: गुरु शरण और निरंतर स्मरण
माया अत्यंत बलवती है, लेकिन इस पर विजय प्राप्त करना असंभव नहीं है। महाराज जी सन्देश देते हैं कि इस मायावी जगत से पार पाने के लिए हमें (Guru Guidance) की शरण में जाना अनिवार्य है। गुरु ही वह ज्योति जलाते हैं जिससे अज्ञान का अंधकार मिटता है। भगवान का निरंतर स्मरण और नाम जप ही वह अस्त्र है, जिससे माया के बंधनों को काटकर परम आनंद की प्राप्ति की जा सकती है।



