BHU Pension Recovery Case: मुर्दा समझकर बीएचयू पांच साल तक बांटता रहा पेंशन, फिर ‘लाश’ लौटकर दफ्तर आई तो उड़ गए होश…
BHU Pension Recovery Case: बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ऐसा मामला चर्चा का विषय बना हुआ है जिसे सुनकर हर कोई दंग है। जिस कर्मचारी को विभाग और परिवार ने मृत मानकर उसकी फाइलें बंद कर दी थीं, वह अचानक (Employee Reappearance Mystery) के रूप में दफ्तर के सामने खड़ा हो गया। यह मामला महज एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि एक जीवित व्यक्ति के ‘कागजी मौत’ और उसके बाद शुरू हुए पारिवारिक पेंशन के खेल की एक अजीबोगरीब दास्तां है।

गुमशुदगी के सात साल और सिस्टम की कागजी कार्रवाई
यह कहानी साल 2013 में शुरू हुई थी, जब एबी हॉस्टल कमच्छा में वरिष्ठ सहायक के पद पर तैनात रमाशंकर राम अचानक लापता हो गए थे। परिवार ने काफी खोजबीन की और थक-हारकर लंका थाने में (Missing Person Investigation) के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई। नियमानुसार सात वर्षों तक इंतजार करने के बाद, जब रमाशंकर का कोई सुराग नहीं मिला, तो प्रशासन ने उन्हें मृत मानते हुए उनके परिवार के लिए पारिवारिक पेंशन की सुविधा शुरू कर दी।
याददाश्त लौटी तो घर नहीं, सीधे दफ्तर पहुंचे रमाशंकर
नवंबर 2025 का महीना बीएचयू प्रशासन के लिए किसी झटके से कम नहीं था, जब रमाशंकर राम अचानक कुलसचिव कार्यालय में प्रकट हुए। उन्होंने बताया कि साल 2007 से ही उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया था और शरीर के बाएं हिस्से में (Neurological Health Recovery) की समस्या के कारण वह लकवाग्रस्त हो गए थे। इतने वर्षों तक वह कहां रहे और किन हालातों में रहे, इसका उन्हें कोई स्पष्ट अंदाजा नहीं है, लेकिन सेहत सुधरने पर उन्हें अपनी पहचान और नौकरी की याद आई।
अपनी ही मौत के बाद पेंशन मिलने पर जताई आपत्ति
जब रमाशंकर को पता चला कि उनके लापता होने के बाद विभाग उन्हें मृत मान चुका है और उनके परिवार को नियमित रूप से पेंशन मिल रही है, तो उन्होंने तुरंत (Administrative Grievance Redressal) का सहारा लिया। उन्होंने 7 और 25 नवंबर को कुलसचिव को पत्र लिखकर न केवल अपने जीवित होने का प्रमाण दिया, बल्कि यह मांग भी की कि परिवार को दी जा रही पेंशन तुरंत रोकी जाए और अब तक दी गई राशि की रिकवरी की जाए।
बीएचयू प्रशासन की हड़बड़ाहट और पेंशन पर रोक
जैसे ही यह मामला उच्च अधिकारियों के संज्ञान में आया, विश्वविद्यालय के सेवा पुस्तिका एवं निवृत्तिका अनुभाग में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में 29 नवंबर को एक आधिकारिक आदेश जारी किया गया, जिसके तहत (Family Pension Suspension) की प्रक्रिया पूरी की गई। प्रशासन अब इस पहेली को सुलझाने में लगा है कि एक व्यक्ति जो सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित हो चुका था, उसके पुनः आगमन के बाद अब कानूनी स्थिति क्या होगी।
सात साल के इंतजार का वो पेचीदा नियम
पेंशन अनुभाग के अधिकारियों के अनुसार, सरकारी सेवा में यदि कोई कर्मचारी लापता हो जाता है, तो उसके लिए सात साल की प्रतीक्षा अवधि का प्रावधान है। इस अवधि के बीतने के बाद पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट और अदालती आदेश के आधार पर ही (Service Record Verification) की प्रक्रिया पूरी कर उसे मृत मान लिया जाता है। रमाशंकर के मामले में भी इसी प्रक्रिया का पालन किया गया था, लेकिन उनके वापस आने ने सभी पुराने नियमों को चुनौती दे दी है।
जीवित होने के प्रमाण और पुरानी फाइलों की पड़ताल
वर्तमान में बीएचयू प्रशासन रमाशंकर राम के जीवित होने के ठोस वैज्ञानिक और कानूनी प्रमाण जुटा रहा है। विभाग उनकी सेवा पुस्तिका और पुराने कैशबुक रिकॉर्ड्स की (Official Document Audit) कर रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सामने खड़ा व्यक्ति वही रमाशंकर राम है जो 2013 में लापता हुआ था। इस प्रकरण ने विश्वविद्यालय की सत्यापन प्रक्रिया और लंबी अनुपस्थिति के मामलों को देखने के नजरिए पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
भविष्य की कार्रवाई और रिकवरी का संकट
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि पिछले पांच वर्षों में परिवार द्वारा उठाई गई पेंशन राशि की भरपाई कैसे होगी। प्रशासन रमाशंकर के मेडिकल दावों और उनके (Employee Identity Validation) की गहन जांच के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लेगा। फिलहाल यह मामला पूरे वाराणसी में चर्चा का केंद्र बना हुआ है कि कैसे एक व्यक्ति अपनों और विभाग की नजरों में मरकर भी दोबारा अपनी पहचान पाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
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