ElNino – बदलते समुद्री तापमान ने बढ़ाई मौसम वैज्ञानिकों की चिंता
ElNino – प्रशांत महासागर में तेजी से बदलते समुद्री तापमान ने दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु एजेंसियों के ताजा आकलनों के अनुसार, आने वाले महीनों में अल नीनो की स्थिति मजबूत हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह प्रभाव ज्यादा तीव्र हुआ तो इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम चक्र पर पड़ सकता है। भारत समेत एशिया और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में कमजोर मानसून, सूखा और गर्मी की तीव्रता बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

इतिहास में दर्ज है गंभीर असर
जलवायु इतिहास पर नजर डालें तो 1877-78 का अल नीनो सबसे गंभीर घटनाओं में गिना जाता है। उस समय भारत, चीन और ब्राजील समेत कई देशों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी थी। बारिश की भारी कमी के कारण खेती चौपट हो गई थी और खाद्यान्न संकट गहरा गया था। इतिहासकारों के मुताबिक, उस दौर में भुखमरी और बीमारियों से बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि ने उस समय वैश्विक मौसम संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया था।
2026 को लेकर क्यों बढ़ी चिंता
NOAA और WMO जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने संकेत दिए हैं कि मई से जुलाई के बीच अल नीनो की स्थिति और स्पष्ट हो सकती है। प्रशांत महासागर में समुद्री सतह का तापमान सामान्य स्तर से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण इस बार इसका प्रभाव अधिक तीव्र हो सकता है। कुछ मौसम मॉडल्स में मजबूत अल नीनो बनने की संभावना जताई गई है, जिससे दुनिया के कई हिस्सों में मौसम पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं।
भारत के मानसून पर पड़ सकता है असर
भारत के लिए अल नीनो हमेशा महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसका सीधा संबंध दक्षिण-पश्चिम मानसून से जुड़ा होता है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इसकी तीव्रता बढ़ती है तो मानसून कमजोर पड़ सकता है। खासतौर पर उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में कम बारिश और अधिक गर्मी की स्थिति बन सकती है। इससे हीटवेव की घटनाएं बढ़ने और जल संकट गहराने की आशंका भी जताई जा रही है।
खेती और खाद्य आपूर्ति पर असर की संभावना
देश की बड़ी आबादी आज भी खेती पर निर्भर है और कृषि का बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश से जुड़ा हुआ है। यदि बारिश सामान्य से कम होती है तो खरीफ फसलों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि धान, दाल और अन्य प्रमुख फसलों का उत्पादन प्रभावित होने से बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। ग्रामीण इलाकों में पानी की कमी और सिंचाई संबंधी चुनौतियां भी बढ़ने की संभावना है।
पानी और बिजली की मांग बढ़ने का अनुमान
कम बारिश की स्थिति बनने पर जलाशयों में पानी का स्तर घट सकता है। इससे पीने के पानी की उपलब्धता के साथ बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ने की आशंका है। कई राज्यों में पहले से ही गर्मी और सूखे जैसी परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन तैयारियों में जुटा है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते जल संरक्षण और संसाधन प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी होगा।
मौसम एजेंसियां लगातार रख रही नजर
भारतीय मौसम विभाग और अन्य वैश्विक संस्थाएं प्रशांत महासागर की गतिविधियों पर लगातार निगरानी बनाए हुए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि हर बार अल नीनो का प्रभाव एक जैसा नहीं होता, लेकिन मौजूदा जलवायु परिस्थितियों में सतर्क रहना जरूरी है। आने वाले महीनों में मौसम संबंधी नए आंकड़ों के आधार पर स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।