Pakistan Privatization Economic Crisis: दिवालिया होने की कगार पर खड़ा है पाकिस्तान, अब बैंक और होटल बेचकर कर्ज चुकाएगी शहबाज सरकार
Pakistan Privatization Economic Crisis: पाकिस्तान का आर्थिक संकट अब उस खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां देश की संप्रभुता और संपत्तियां दांव पर लगी हैं। सरकारी एयरलाइंस (PIA) की सार्वजनिक नीलामी के बाद, अब शहबाज शरीफ सरकार ने बैंकों और आलीशान होटलों को भी बेचने की तैयारी मुकम्मल कर ली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, (financial instability in Pakistan) इस कदर बढ़ गई है कि रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए अब मुल्क की चांदी काटने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचा है। यह केवल एक व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि एक डूबते हुए देश की चीख है जो अंतरराष्ट्रीय कर्ज के बोझ तले दबा जा रहा है।

आईएमएफ की सख्त शर्तें और ‘करो या मरो’ की स्थिति
पाकिस्तानी हुकूमत के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ से मिलने वाला कर्ज ही जीवनदान बना हुआ है, लेकिन यह मदद अब बेहद कड़वी शर्तों के साथ आ रही है। डिफॉल्ट होने के खौफ से कांप रही (IMF bailouts conditions) को पूरा करने के लिए सरकार ने मजबूरी में निजीकरण का रास्ता चुना है। सरकारी अफसरों ने स्पष्ट रूप से इसे ‘करो या मरो’ की स्थिति करार दिया है। कैबिनेट मीटिंग्स से छनकर आई खबरों के अनुसार, साल 2026 के अंत तक मुल्क के कई महत्वपूर्ण संस्थान निजी हाथों में सौंप दिए जाएंगे, ताकि विदेशी मुद्रा भंडार को कुछ सहारा मिल सके।
क्या है ‘एजेंडा-5’ और शरीफ सरकार का गुप्त मास्टर प्लान?
निजीकरण की इस विशाल प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए शहबाज सरकार ने ‘एजेंडा-5’ नामक एक विशेष योजना तैयार की है। इस रणनीतिक ढांचे के तहत (privatization policy Pakistan) के अगले 12 महीनों के भीतर पांच प्रमुख क्षेत्रों को पूरी तरह निजी कंपनियों के हवाले कर दिया जाएगा। इन क्षेत्रों में बिजली वितरण कंपनियां, बैंकिंग सेक्टर, होटल, एनर्जी जनरेशन कंपनियां और बड़े रिटेल नेटवर्क शामिल हैं। सरकार का मानना है कि इन संपत्तियों को बेचकर जो नकदी मिलेगी, उससे तात्कालिक आर्थिक झटकों को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
हाइब्रिड सिस्टम का खेल: सेना प्रमुख और प्रधानमंत्री की जुगलबंदी
पाकिस्तान में चल रहा यह निजीकरण प्रोग्राम वहां के मौजूदा हाइब्रिड पॉलिटिकल सिस्टम की उपज माना जा रहा है। इसमें प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के फैसलों के पीछे सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की (civil military governance) वाली ताकतवर भूमिका बताई जा रही है। सेना और सरकार का यह गठजोड़ निजीकरण को आर्थिक सुधार का इकलौता रास्ता बता रहा है। हालांकि, विपक्षी खेमे में इसे सरकार की घोर नाकामी के रूप में देखा जा रहा है। विरोधियों का स्पष्ट आरोप है कि चंद पैसों के लिए देश की कीमती संपत्तियों को बेचना भविष्य की पीढ़ियों के साथ खिलवाड़ है।
विदेशी कर्ज का पहाड़ और श्रीलंका जैसी तबाही की आहट
पाकिस्तान की माली हालत आज पूरी दुनिया के सामने एक सबक बन चुकी है, जहां करीब 131 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज देश की कमर तोड़ रहा है। (Pakistan foreign debt burden) का आलम यह है कि नए कर्ज की किश्तें पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जा रही हैं। आर्थिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि संपत्तियां बेचने के बाद भी हालात नहीं सुधरे, तो पाकिस्तान बहुत जल्द श्रीलंका जैसे जन-विद्रोह और पूर्ण आर्थिक ठप होने की स्थिति में पहुंच सकता है। बिजली की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि और बढ़ती महंगाई ने जनता के सब्र का बांध पहले ही तोड़ दिया है।
बैंकिंग और इंश्योरेंस सेक्टर पर निजी हाथों का कब्जा
निजीकरण की इस लिस्ट में सिर्फ घाटे में चल रही कंपनियां ही नहीं, बल्कि मुनाफा देने वाले बैंक और बीमा संस्थान भी शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि (public sector enterprises) को निजी हाथों में सौंपने से उनकी कार्यक्षमता बढ़ेगी और सरकारी खजाने पर बोझ कम होगा। लेकिन ट्रेड यूनियनों और आम जनता में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि उनके भरोसे के संस्थानों को कॉर्पोरेट घरानों के हवाले क्यों किया जा रहा है। बीमा और एनर्जी सेक्टर में निजीकरण से आने वाले समय में सेवाओं की कीमतों में भारी उछाल आने की आशंका जताई जा रही है।
संप्रभुता पर संकट और जनता का बढ़ता आक्रोश
पाकिस्तान में इस समय जो माहौल है, वह एक बड़े सामाजिक विस्फोट का संकेत दे रहा है। लोग अपनी सरकार से पूछ रहे हैं कि क्या सब कुछ बेच देने के बाद (sovereignty of Pakistan) सुरक्षित रह पाएगी? होटलों और रियल एस्टेट को बेचने की योजना ने मध्यम वर्ग को निराश किया है, क्योंकि वे इसे देश की पहचान और विरासत का हिस्सा मानते हैं। सरकार की यह ‘सेल’ नीति न केवल आर्थिक संकट को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि पाकिस्तान के पास अब भविष्य के लिए कोई ठोस विजन नहीं बचा है।
निष्कर्ष: नीलामी के मंच पर खड़ा पाकिस्तान और भविष्य की धुंध
पाकिस्तान के लिए आने वाले दो साल बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं। निजीकरण की यह दौड़ उसे (economic recovery challenges) से उबार पाएगी या फिर उसे गुलामी की नई जंजीरों में जकड़ देगी, यह एक बड़ा सवाल है। होटल, बैंक और एयरलाइंस बेचने के बाद भी अगर कर्ज कम नहीं हुआ, तो मुल्क के पास बेचने के लिए कुछ खास नहीं बचेगा। अब समय ही बताएगा कि शहबाज शरीफ और जनरल मुनीर का यह ‘एजेंडा-5’ पाकिस्तान को डूबने से बचाता है या उसकी तबाही की रफ्तार को और तेज कर देता है।



