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Supreme Court Verdict on Government Jobs: क्या सरकारी कॉलेज में एडमिशन मतलब पक्की सरकारी नौकरी, सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने हिला दी उम्मीदों की दुनिया…

Supreme Court Verdict on Government Jobs: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है जो देश के लाखों छात्रों और नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं के भविष्य को प्रभावित करेगा। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि किसी भी सरकारी शैक्षणिक संस्थान में केवल दाखिला ले लेने या वहां से अपनी डिग्री पूरी कर लेने मात्र से कोई व्यक्ति (legal right to employment) का दावा नहीं कर सकता। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने स्पष्ट किया कि शिक्षा प्राप्त करना और सार्वजनिक रोजगार प्राप्त करना दो अलग-अलग चीजें हैं, जिन्हें एक साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

Supreme Court Verdict on Government Jobs
Supreme Court Verdict on Government Jobs

इलाहाबाद हाई कोर्ट के पुराने आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस पुराने निर्णय को पूरी तरह से पलट दिया है, जिसने उत्तर प्रदेश सरकार को नर्सिंग के छात्रों को सीधे नौकरी देने का निर्देश दिया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान (judicial review of policy) की शक्तियों का उपयोग करते हुए पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय का यह तर्क तार्किक नहीं है कि प्रशिक्षण पूरा करने वाले हर छात्र को नियुक्ति दी ही जाए। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर की गई अपील को स्वीकार करते हुए अदालत ने इस कानूनी विवाद पर पूर्णविराम लगा दिया है।

नीति में बदलाव और ‘जायज उम्मीद’ का कानूनी तर्क

अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या पिछली प्रथाओं के आधार पर छात्र नौकरी की उम्मीद कर सकते हैं। इस पर फैसला देते हुए पीठ ने कहा कि जब सरकार अपनी भर्ती नीति या चयन प्रक्रिया में बदलाव करती है, तो छात्र किसी भी (legitimate expectation of recruitment) का सहारा लेकर कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटा सकते। नीतिगत बदलाव जनहित और बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं, जिन्हें चुनौती देना तब तक कठिन है जब तक वे मनमाने न हों।

आयुर्वेदिक नर्सिंग ट्रेनिंग कोर्स और पुरानी परंपरा का अंत

यह पूरा विवाद आयुर्वेदिक नर्सिंग ट्रेनिंग कोर्स से जुड़ा था, जिसमें पहले दाखिला लेने वाले उम्मीदवारों को पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद स्टाफ नर्स के पदों पर सीधे नियुक्त कर दिया जाता था। छात्र इसी (past practice of appointment) का हवाला देकर नौकरी की मांग कर रहे थे, लेकिन अदालत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। सरकार ने अपनी दलील में स्पष्ट किया कि पहले सीटों की संख्या बहुत कम थी और जरूरत ज्यादा, इसलिए सीधे नियुक्ति दी जाती थी, जो अब संभव नहीं है।

योग्य उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या और बदला हुआ माहौल

अदालत ने अपने फैसले में एक बहुत ही महत्वपूर्ण जमीनी हकीकत का जिक्र किया कि अब योग्य उम्मीदवारों की संख्या में भारी उछाल आया है। जैसे-जैसे (competitive job market) का विस्तार हुआ है और संसाधनों में वृद्धि हुई है, भर्ती का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। ऐसे में पुरानी प्रथाओं को ढोना न तो प्रशासनिक रूप से सही है और न ही यह न्यायसंगत है, क्योंकि इससे अन्य योग्य उम्मीदवारों के साथ भेदभाव होने की संभावना बढ़ जाती है।

निजी संस्थानों के आने से पैदा हुई नई चुनौतियां

उत्तर प्रदेश सरकार ने बताया कि साल 2011 के बाद से निजी संस्थानों को भी नर्सिंग कोर्स कराने की अनुमति दे दी गई थी। इसके परिणामस्वरूप प्रशिक्षित युवाओं की एक बड़ी फौज तैयार हो गई, जो उपलब्ध (vacant government positions) की तुलना में कहीं अधिक थी। जब उम्मीदवारों की संख्या हजारों में हो और पद सीमित, तो ऐसे में सरकारी कॉलेजों के छात्रों को तरजीह देना समानता के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है।

दशकों पुरानी सीमित सीटों वाली प्रथा अब हुई अप्रासंगिक

दशकों पहले जब सरकारी आयुर्वेदिक नर्सिंग कोर्स की सीटें केवल 20 तक सीमित थीं, तब रिक्त पदों को भरने के लिए बिना किसी प्रतियोगी परीक्षा के नियुक्तियां करना एक मजबूरी थी। लेकिन अब जब (recruitment policy changes) लागू हो चुकी हैं, तो वैसी ही प्रक्रिया अपनाना संभव नहीं है। अदालत ने माना कि हालात की जरूरत के हिसाब से पहले जो सही था, वह आज के आधुनिक और प्रतिस्पर्धी युग में सही नहीं ठहराया जा सकता।

भावना मिश्रा और अंकिता मौर्या बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भावना मिश्रा, अंकिता मौर्या और अन्य कई प्रशिक्षुओं ने याचिका दायर कर अपनी नियुक्ति की मांग की थी। हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को (mandatory job placement) के आदेश दिए थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों में वजन पाया और माना कि हाई कोर्ट ने छात्रों की भावनात्मक दलीलों को कानूनी अधिकारों के ऊपर जगह दे दी थी, जिसे सुधारना आवश्यक था।

सरकारी खजाने और प्रशासनिक नीति पर सर्वोच्चता

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सरकार के पास यह विशेषाधिकार है कि वह अपनी भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी और योग्यता-आधारित बनाए। किसी भी (executive policy making) मामले में न्यायपालिका तब तक हस्तक्षेप नहीं करती जब तक कि वह संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ न हो। सीधे नियुक्ति की प्रथा को बंद करना एक प्रशासनिक निर्णय था, जिसे अदालत ने पूरी तरह से वैध और उचित करार दिया है।

छात्रों के लिए संदेश: डिग्री नहीं, प्रतिस्पर्धा दिलाएगी नौकरी

इस फैसले के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के छात्रों को एक कड़ा लेकिन जरूरी संदेश दिया है। अब सरकारी संस्थानों में प्रवेश पाना (guarantee of government job) नहीं रह गया है। छात्रों को अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद निर्धारित चयन प्रक्रियाओं, जैसे कि लिखित परीक्षा और साक्षात्कार, से गुजरना ही होगा। केवल सरकारी डिग्री के आधार पर नियुक्ति की मांग करना अब अतीत की बात हो चुकी है और योग्यता ही सफलता का एकमात्र पैमाना होगी।

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