उत्तर प्रदेश

Mauni Amavasya Sangam Snan 2026: संगम की रेती पर उमड़ा आस्था का सैलाब, मौनी अमावस्या पर ‘मौन’ डुबकी ने तोड़े सारे रिकॉर्ड

Mauni Amavasya Sangam Snan 2026:  उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में माघ मेले के सबसे महत्वपूर्ण पर्व मौनी अमावस्या पर आस्था की एक ऐसी डोर बंधी कि लाखों श्रद्धालु खिंचे चले आए। संगम तट पर श्रद्धालुओं को न तो कड़कड़ाती ठंड और कोहरे ने डराया और न ही कई किलोमीटर की लंबी पैदल दूरी उनके संकल्प को डिगा सकी। (Spiritual Gathering Trends) के बीच इस बार का मेला अपनी दिव्यता और भव्यता के लिए लंबे समय तक याद रखा जाएगा। सुबह के वक्त जब संगम क्षेत्र घने कोहरे की चादर में लिपटा था, तब भी श्रद्धालुओं की अटूट कतारें मोक्ष की कामना लिए निरंतर आगे बढ़ती रहीं।

Mauni Amavasya Sangam Snan 2026
Mauni Amavasya Sangam Snan 2026

बुजुर्ग इंद्राणी देवी का जज्बा और भक्ति की पराकाष्ठा

अक्षयवट संगम चौराहे पर एक ऐसा दृश्य दिखा जिसने हर किसी को भावुक कर दिया। 88 वर्ष की बुजुर्ग महिला इंद्राणी देवी अपनी झुकी हुई कमर और चेहरे की झुर्रियों के बावजूद अपने बेटे अरुण प्रताप का हाथ थामे संगम नोज की ओर बढ़ रही थीं। (Devotional Perseverance) का यह अनूठा उदाहरण था कि जीटी जवाहर चौराहे से मीलों पैदल चलकर आने के बावजूद उनके चेहरे पर थकान नहीं बल्कि एक दिव्य चमक थी। जैसे ही उन्होंने संगम की लहरों को देखा, उनके मुंह से बस यही निकला कि ‘संगम आ गया’, अब बस जल्दी से पावन डुबकी लगानी है।

बिहार के श्रद्धालुओं की नंगे पांव पदयात्रा और अनुशासन

माघ मेले में अनुशासन की एक अद्भुत मिसाल बिहार के मोतिहारी से आए 120 श्रद्धालुओं ने पेश की। ये सभी श्रद्धालु नंगे पांव पैदल चलकर संगम पहुंचे और सामूहिक रूप से (Religious Pilgrimage Experience) को यादगार बनाया। खास बात यह थी कि सभी ने सिर पर भोले बाबा की प्रसादी पगड़ी बांधी हुई थी और एक समान वेशभूषा में नजर आए। नंगे पांव कंकड़-पत्थरों के बीच चलते हुए इन श्रद्धालुओं का समूह माघ मेले में आस्था, समर्पण और सामूहिकता का एक बड़ा संदेश देता हुआ दिखाई दिया।

अयोध्या और चित्रकूट के बाद संगम का पड़ाव

मोतिहारी के इन श्रद्धालुओं की यात्रा का सफर काफी लंबा और भक्तिपूर्ण रहा है। दीपक यादव और मुन्ना सिंह जैसे श्रद्धालुओं ने बताया कि वे 14 जनवरी को अयोध्या पहुंचे थे, जहां उन्होंने प्रभु श्री राम के दर्शन किए। इसके बाद (Traditional Holy Tour) के क्रम में उन्होंने चित्रकूट के दर्शन किए और फिर प्रयागराज की पावन रेती पर आए। संगम स्नान के बाद इनका अगला पड़ाव भगवान शिव की नगरी काशी है। वे संगम का पवित्र जल साथ लेकर अपने गांव लौटेंगे ताकि अपने स्थानीय शिवालयों में जलाभिषेक कर सकें।

संगम की धूल और आस्था का गहरा नाता

बिहार से आए एक अन्य श्रद्धालु अशोक झा ने अपनी गहरी श्रद्धा प्रकट करते हुए कहा कि वे संगम क्षेत्र में अपनी चप्पल पहनकर प्रवेश नहीं कर सकते। उनके लिए यहाँ की (Sacred Sand Belief) ही सबसे बड़ी औषधि और प्रसाद है। उनका कहना था कि वे संगम की पावन धूल को अपने साथ घर लेकर जाएंगे। इसी तरह दिव्यांग सुनीता भी अपने लड़खड़ाते कदमों के साथ स्नान के लिए पहुँची थीं। उन्होंने बताया कि उनकी तीन पीढ़ियां हर मौनी अमावस्या पर यहाँ आती रही हैं, इसलिए वे इस परंपरा को किसी भी हाल में तोड़ना नहीं चाहती थीं।

भोर के कोहरे के बाद खिली धूप ने बढ़ाया उत्साह

रविवार की सुबह करीब 8:30 बजे तक संगम तट पर घना कोहरा छाया हुआ था, लेकिन जैसे ही सूरज की पहली किरणें घाटों पर पड़ीं, श्रद्धालुओं के चेहरे खिल उठे। (Weather Impact on Festivals) के बावजूद दशाश्वमेध घाट से लेकर संगम के हर कोने तक युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। धूप निकलने के साथ ही श्रद्धालुओं की ऊर्जा दोगुनी हो गई और पूरा वातावरण ‘जय श्रीराम’ और ‘हर-हर गंगे’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। लोग न केवल स्नान कर रहे थे, बल्कि अपने पूर्वजों की शांति के लिए तर्पण भी कर रहे थे।

मौन डुबकी के साथ पुरोहितों से लिया आशीर्वाद

मौनी अमावस्या का महत्व ‘मौन’ रहकर स्नान करने में है और श्रद्धालुओं ने इस परंपरा का पूरी निष्ठा से पालन किया। स्नान के पश्चात घाटों पर बैठे पुरोहितों से माथे पर चंदन लगवाना और फिर (Ritualistic Holy Water) को पीतल के कलशों में भरना एक मुख्य आकर्षण रहा। हर कोई अपने परिजनों और शुभचिंतकों के लिए गंगाजल संजोने में जुटा था। ऊर्जा का संचार ऐसा था कि वृद्धजन भी जयकारों के साथ घाटों की सीढ़ियाँ चढ़ते नजर आए, जिससे यह मेला केवल एक आयोजन नहीं बल्कि आस्था का महाकुंभ बन गया।

सुरक्षा और प्रबंधों के बीच संपन्न हुआ मुख्य स्नान

प्रयागराज प्रशासन ने श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। भारी वाहनों को पार्किंग स्थलों पर ही रोक दिया गया था, जिसके कारण लोगों को (Crowd Management Logistics) का पालन करते हुए पैदल यात्रा करनी पड़ी। हालांकि, श्रद्धालुओं के लिए यह परेशानी नहीं बल्कि उनकी साधना का हिस्सा थी। नेहरू पार्क स्थित पार्किंग से लेकर संगम नोज तक सुरक्षाकर्मी मुस्तैद रहे ताकि कोई अप्रिय घटना न हो। शाम तक लाखों लोग सुरक्षित रूप से स्नान कर अपने-अपने गंतव्यों की ओर प्रस्थान कर चुके थे।

आस्था के आगे बौनी साबित हुई हर मुश्किल

अंततः मौनी अमावस्या का यह पर्व यह साबित कर गया कि जब मन में ईश्वर के प्रति समर्पण हो, तो शारीरिक कमियां और भौगोलिक दूरियां मायने नहीं रखतीं। (Human Faith Power) की जीत का यह उत्सव माघ मेले के इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ गया। प्रयागराज के संगम ने एक बार फिर दुनिया को दिखाया कि क्यों इसे तीर्थों का राजा ‘तीर्थराज’ कहा जाता है। श्रद्धालुओं का यह रेला अब बसंत पंचमी के अगले स्नान पर्व की प्रतीक्षा में अपनी स्मृतियां संजोकर वापस लौट रहा है।

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