US Student Visa Crisis 2026: ट्रंप 2.0 का खौफ! भारतीय छात्रों के एडमिशन में आई 75% की ऐतिहासिक गिरावट
US Student Visa Crisis 2026: ट्रंप प्रशासन की दूसरी पारी के पहले ही साल में अमेरिकी विश्वविद्यालयों के गलियारे सूने नजर आने लगे हैं। एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय छात्रों के नामांकन (Enrollment) में 75% तक की कमी आई है, जिसे दशकों की सबसे बड़ी गिरावट माना जा रहा है। हैदराबाद स्थित प्रमुख कंसल्टेंसी ‘i20 फीवर’ के अरविंद मंडुवा का कहना है कि (Unprecedented Enrollment Drop) के कारण अब छात्र अमेरिका के टॉप 40 विश्वविद्यालयों में आवेदन करने से भी कतरा रहे हैं। यह स्थिति भारतीय परिवारों के बीच बढ़ते डर और अनिश्चितता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

वीज़ा रिजेक्शन का ‘भूत’ और छात्रों की हिचकिचाहट
इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण वीज़ा मिलने में आने वाली मुश्किलें और सीमित स्लॉट्स हैं। सलाहकारों के अनुसार, (Visa Rejection Anxiety) ने छात्रों के मनोबल को पूरी तरह तोड़ दिया है। पहले जहां छात्र गर्व से अमेरिका जाने की तैयारी करते थे, अब वे रिजेक्शन के डर से आवेदन ही नहीं कर रहे हैं। वीज़ा प्रोसेसिंग में हो रही देरी और स्लॉट्स की कमी ने एडमिशन प्रक्रिया को एक कठिन अग्निपरीक्षा में बदल दिया है, जिससे भारतीय छात्रों का ‘अमेरिकन ड्रीम’ धुंधला पड़ता जा रहा है।
ट्रंप की सख्त नीतियां और 41% रिजेक्शन रेट
आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति और भी भयावह नजर आती है। अमेरिकी एफ-1 छात्र वीज़ा की अस्वीकृति दर अब तक के उच्चतम स्तर 41% पर पहुंच गई है। ट्रंप प्रशासन की सख्त आव्रजन नीतियों (Stricter Immigration Policies) ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। इसमें 19 देशों पर लगाए गए यात्रा प्रतिबंध, वीज़ा आवेदकों की कड़ी जांच और छोटी सी गलती पर डिपोर्टेशन (देश निकाला) की धमकी शामिल है। भारत से आने वाले आवेदनों में 44% से अधिक की कमी इसी प्रशासनिक सख्ती का सीधा परिणाम है।
सोशल मीडिया स्क्रीनिंग और प्राइवेसी पर खतरा
नए नियमों के तहत अब छात्र वीज़ा आवेदकों की सोशल मीडिया गतिविधियों की भी बारीकी से जांच की जा रही है। छात्र इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि (Enhanced Social Media Vetting) के कारण उनके पुराने पोस्ट या टिप्पणियां उनके करियर में बाधा बन सकती हैं। जांच का यह स्तर और पोस्ट-एंट्री स्क्रीनिंग की सख्ती ने एक लाख से अधिक वीज़ा रद्द होने का मार्ग प्रशस्त किया है, जिनमें 8,000 से अधिक छात्र वीज़ा शामिल हैं। इस तरह की निगरानी ने छात्रों के बीच असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था और नवाचार को तगड़ा झटका
भारतीय छात्र न केवल अमेरिकी विश्वविद्यालयों के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत हैं, बल्कि वे वहां के नवाचार (Innovation) का भी आधार रहे हैं। अमेरिकी कैंपस में अंतरराष्ट्रीय छात्रों का एक तिहाई हिस्सा भारतीय हैं। (Impact on US Universities Revenue) का आकलन करें तो यह गिरावट अमेरिकी संस्थानों की आय में अरबों डॉलर की सेंध लगा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय छात्र अमेरिका से मुंह मोड़ते हैं, तो वहां की रिसर्च और टेक इंडस्ट्री में टैलेंट की भारी कमी हो जाएगी, जिससे अमेरिका की ग्लोबल रैंकिंग गिर सकती है।
कनाडा और यूरोप की ओर मुड़ता छात्रों का रुख
अमेरिका में बढ़ती अनिश्चितता के कारण अब भारतीय छात्र वैकल्पिक देशों की तलाश कर रहे हैं। हालांकि कनाडा में भी अस्वीकृति दर 74% तक बढ़ी है, लेकिन (Alternative Study Destinations) के रूप में यूके, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश अब भारतीयों की पहली पसंद बन रहे हैं। इन देशों की उदार वीज़ा नीतियां और पढ़ाई के बाद काम करने के स्पष्ट अवसर छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं। छात्र अब वहां जाना पसंद कर रहे हैं जहां उनकी गरिमा सुरक्षित हो और करियर की गारंटी हो।
भविष्य की अनिश्चितता और प्रोफेशनल्स का मोहभंग
यह संकट केवल छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका में काम कर रहे भारतीय प्रोफेशनल्स भी अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। (Career Uncertainty in US) के चलते एच-1बी वीज़ा धारक और ग्रीन कार्ड के इच्छुक लोग भी अब अपनी योजनाओं पर पुनर्विचार कर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन का ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा भारतीयों के लिए ‘अमेरिका लास्ट’ साबित हो रहा है। अगर जल्द ही नियमों में नरमी नहीं आई, तो वैश्विक शिक्षा के मानचित्र पर अमेरिका अपना शीर्ष स्थान खो सकता है।



