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बिहार

AgriTraining – 22 जिलों में रुकी कौशल प्रशिक्षण योजना, सख्त हुआ विभाग

AgriTraining – बिहार में किसानों और बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से शुरू की गई कौशल विकास पहल को बड़ा झटका लगा है। राज्य के 22 जिलों में यह प्रशिक्षण कार्यक्रम ठप पड़ गया है, जिससे हजारों लाभार्थी प्रभावित हुए हैं। इस मामले में बिहार कृषि विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं, जिसके बाद कृषि विभाग ने सख्त रुख अपनाते हुए विश्वविद्यालय को जारी की गई राशि वापस लेने का निर्णय किया है।

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योजना का उद्देश्य और जमीनी हकीकत में अंतर
राज्य सरकार की सात निश्चय योजना के तहत कृषि आधारित रोजगार को बढ़ावा देने के लिए किसानों और युवाओं को विशेष प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गई थी। इस पहल का लक्ष्य था कि लोग पारंपरिक खेती के साथ-साथ नए क्षेत्रों में भी कौशल हासिल कर सकें। लेकिन जमीनी स्तर पर यह योजना अपेक्षित तरीके से लागू नहीं हो सकी। प्रशिक्षण कार्यक्रम समय पर आयोजित नहीं किए गए, जिसके कारण बड़ी संख्या में इच्छुक प्रतिभागी इस सुविधा से वंचित रह गए।

कृषि विश्वविद्यालय और केंद्रों की भूमिका पर सवाल
इस पूरी योजना के संचालन की जिम्मेदारी बिहार कृषि विश्वविद्यालय से जुड़े संस्थानों को दी गई थी। विश्वविद्यालय के अधीन आने वाले आठ कॉलेज और 22 कृषि विज्ञान केंद्र इस कार्य में शामिल थे। हालांकि, इन संस्थानों की उदासीनता के कारण योजना का क्रियान्वयन प्रभावित हुआ। कई जिलों से यह रिपोर्ट सामने आई कि प्रशिक्षण सत्र या तो शुरू ही नहीं हुए या फिर अधूरे रह गए। इससे योजना की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ा है।

विभागीय बैठक में जताई गई नाराजगी
24 मार्च को आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई। कृषि विभाग के शीर्ष अधिकारियों ने इस स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की और इसे लापरवाही का मामला माना। बैठक में यह निर्णय लिया गया कि प्रशिक्षण के लिए जारी की गई धनराशि विश्वविद्यालय से वापस ली जाएगी। विभाग का मानना है कि यदि समय पर प्रशिक्षण होता, तो कई युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकते थे और कृषि क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा मिलता।

प्रशिक्षण के जरिए मिलना था स्वरोजगार का अवसर
इस योजना के तहत प्रतिभागियों को मधुमक्खी पालन, मखाना उत्पादन, मशरूम खेती, वर्मी कंपोस्ट और नर्सरी प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाना था। साथ ही मिट्टी और पानी की जांच से जुड़ी तकनीकों की जानकारी भी दी जानी थी। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र मिलने का प्रावधान था, जिससे वे बैंक से ऋण लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर सकें। लेकिन प्रशिक्षण न होने से यह पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो गई।

कई प्रमुख केंद्रों में रही सुस्ती
राज्य के कई महत्वपूर्ण केंद्रों पर इस योजना के प्रति अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखी। सबौर, सहरसा, डुमराव, किशनगंज और पूर्णिया जैसे स्थानों से लापरवाही की शिकायतें सामने आई हैं। इन क्षेत्रों में प्रशिक्षण कार्यक्रम या तो समय पर शुरू नहीं हुए या फिर उनकी गुणवत्ता पर सवाल उठे। अब विभाग उन संस्थानों की पहचान कर रहा है जहां सबसे अधिक ढिलाई बरती गई, ताकि आगे की कार्रवाई तय की जा सके।

आगे की रणनीति पर नजर
कृषि विभाग इस मामले को केवल वित्तीय अनियमितता के रूप में नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण अवसर के नुकसान के तौर पर देख रहा है। विभाग की कोशिश है कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने और योजनाओं का क्रियान्वयन समयबद्ध तरीके से हो। साथ ही यह भी सुनिश्चित करने की बात कही जा रही है कि किसानों और युवाओं को योजनाओं का पूरा लाभ मिल सके।

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