Bihar Soil Degradation ISRO Report: बंजर हो रही है बिहार की कोख, साढ़े सात लाख हेक्टेयर जमीन पर मंडराया संकट
Bihar Soil Degradation ISRO Report: बिहार की वह माटी जो कभी सोना उगलती थी, अब धीरे-धीरे अपनी उर्वरता खोकर रेगिस्तान की ओर बढ़ रही है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सैटेलाइट एप्लीकेशन सेंटर ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बेहद चौंकाने वाले तथ्य पेश किए हैं। इस शोध के अनुसार, राज्य की (Land Degradation Trends in Bihar) का ग्राफ तेजी से बढ़ा है और अब तक 7.50 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि की मिट्टी पूरी तरह खराब हो चुकी है। कोसी, सीमांचल और पूर्वी बिहार के जिलों में स्थिति इतनी विकट है कि आने वाले समय में यहां खेती करना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

इसरो के एटलस में कैद हुई बदहाल तस्वीर
‘डिग्रेडेशन एंड लैंड डिजर्टीफिकेशन एटलस ऑफ इंडिया’ के आंकड़ों पर नजर डालें तो बिहार में मिट्टी के क्षरण की रफ्तार साल-दर-साल डराने वाली रही है। साल 2011-12 में जहां 7.38 प्रतिशत भूमि प्रभावित थी, वहीं 2021-22 तक यह आंकड़ा बढ़कर 8.87 प्रतिशत (Soil Erosion Statistics India) पर पहुंच गया है। रिपोर्ट बताती है कि केवल बाढ़ और कटाव ने 3.21 लाख हेक्टेयर जमीन को लील लिया है, जबकि जंगलों के विनाश और बढ़ते शहरीकरण ने लाखों हेक्टेयर उपजाऊ धरती को कंक्रीट के ढेर में बदल दिया है।
लवणीकरण: खेतों में घुलता हुआ धीमा जहर
इसरो की इस विस्तृत रिपोर्ट में ‘लवणीकरण’ यानी मिट्टी में बढ़ती नमक की मात्रा को एक बड़े विलेन के रूप में दिखाया गया है। भागलपुर, खगड़िया, सुपौल, कटिहार और पूर्णिया जैसे जिलों में लगभग 3.2 लाख हेक्टेयर भूमि (Soil Salinity Impact on Agriculture) की चपेट में है। जब मिट्टी में नमक की मात्रा बढ़ जाती है, तो फसलों की जल ग्रहण करने की क्षमता और सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता खत्म हो जाती है। परिणाम स्वरूप, लहलहाते खेत धीरे-धीरे बंजर मैदानों में तब्दील हो रहे हैं, जिससे किसानों की आजीविका पर सीधा प्रहार हो रहा है।
रासायनिक उर्वरकों का आत्मघाती उपयोग
प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ इंसान की अपनी गलतियां भी मिट्टी की मौत का कारण बन रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिक पैदावार के लालच में रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित उपयोग (Chemical Fertilizer Overuse Consequences) मिट्टी की जैविक विविधता को खत्म कर रहा है। इसके साथ ही पराली जलाने की बढ़ती घटनाओं ने मिट्टी के मित्र जीवाणुओं को नष्ट कर दिया है। मृदा वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि उर्वरकों के इस अंधाधुंध इस्तेमाल पर रोक नहीं लगी, तो बिहार की धरती अपनी उत्पादन क्षमता पूरी तरह खो देगी।
आजीविका और मानव स्वास्थ्य पर गहरा आघात
मिट्टी का यह क्षरण केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर मानव स्वास्थ्य और जल की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है। प्रदूषित मिट्टी से उगने वाली फसलें जहरीली हो रही हैं, जो (Human Health and Soil Degradation) के बीच एक खतरनाक संबंध स्थापित कर रही हैं। दूषित जल और पोषक तत्वों की कमी के कारण कुपोषण और गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं। कटाव के कारण ऊपरी उपजाऊ मिट्टी बह जाने से भूमि की उर्वरता वापस लाने में अब दशकों का समय लग सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर भी संकट खड़ा हो गया है।
जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण की दोहरी मार
बीएयू सबौर में रिसर्च कर रहे इसरो वैज्ञानिक देबजीत चक्रवर्ती का कहना है कि बिहार में मिट्टी का स्वरूप बदलने के पीछे जलवायु परिवर्तन एक बड़ी वजह है। बार-बार आने वाली विनाशकारी बाढ़ और फिर लंबे सूखे की स्थिति (Climate Change and Land Desertification) की प्रक्रिया को तेज कर देती है। वहीं, तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने बस्तियों के विस्तार के लिए 28,200 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि को नष्ट कर दिया है। प्रकृति और मानव जनित इन कारकों ने मिलकर बिहार की पारिस्थितिकी को असंतुलित कर दिया है।
जैविक खेती: बंजर होती धरती की आखिरी उम्मीद
इस भीषण संकट से उबरने का एकमात्र रास्ता अब प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर लौटना ही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि (Organic Farming Benefits for Soil) को अपनाकर मिट्टी के स्वास्थ्य को फिर से सुधारा जा सकता है। मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने के लिए हरी खाद, कंपोस्ट और फसलों के चक्र में बदलाव करना अनिवार्य है। सरकार को भी किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर पारंपरिक और टिकाऊ कृषि पद्धतियों की ओर प्रोत्साहित करने के लिए ठोस नीतिगत कदम उठाने होंगे।
निष्कर्ष: वक्त रहते चेतने की जरूरत
इसरो की यह रिपोर्ट बिहार के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। यदि हम अब भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियों के पास विरासत में केवल बंजर जमीन ही बचेगी। मिट्टी की रक्षा करना (Environmental Conservation Bihar) का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। उपजाऊ धरती को बचाना केवल किसानों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह एक सामूहिक लड़ाई है ताकि बिहार की हरियाली और खुशहाली को फिर से बहाल किया जा सके।



