Criminal Justice System Reforms: बिहार में ट्राल इन अब्सेंटिया की हुई शुरुआत, अब छिपने से नहीं मिलेगी सजा से मुक्ति
Criminal Justice System Reforms: बिहार ने देश की न्याय व्यवस्था में एक क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी है। अब राज्य के न्यायालयों में उन अपराधियों के खिलाफ भी मुकदमे (Trial) चल सकेंगे जो गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हैं। ‘ट्रायल इन अब्सेंटिया’ (अनुपस्थिति में विचारण) के इस प्रावधान को लागू करने वाला बिहार देश का पहला राज्य बन गया है। गृह विभाग के इस निर्णय से उन अपराधियों के हौसले पस्त होंगे जो कानूनी प्रक्रिया में जानबूझकर बाधा डालते हैं और लंबे समय तक फरार रहकर सजा से बच निकलते हैं।

न्याय से भागने वालों पर नकेल
अक्सर देखा जाता है कि गंभीर मामलों के अभियुक्त अपनी गिरफ्तारी से बचने या सजा में देरी करने के लिए फरार हो जाते हैं। इसके चलते अदालती कार्यवाही (Judicial Proceedings Pendency) वर्षों तक लटकी रह जाती है और पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है। नये प्रावधान के तहत अब न्यायालय अभियुक्त की शारीरिक उपस्थिति के बिना भी मुकदमे को जारी रख सकेगा। यह कदम न केवल न्याय प्रक्रिया को तेज करेगा, बल्कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता को भी और अधिक मजबूत करेगा।
धारा 355: बीएनएसएस का नया ब्रह्मास्त्र
पुराने कानून (CrPC) में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था जो फरार अभियुक्त की अनुपस्थिति में पूरा ट्रायल चलाने की अनुमति देता हो। हालांकि, (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita 2023) की धारा 355 और 356 के तहत इस महत्वपूर्ण प्रावधान को शामिल किया गया है। यह नई धारा अदालतों को यह शक्ति प्रदान करती है कि यदि कोई अभियुक्त जानबूझकर पेश नहीं हो रहा है, तो उसके खिलाफ साक्ष्य दर्ज किए जा सकते हैं और फैसला भी सुनाया जा सकता है।
ट्रायल शुरू करने की अनिवार्य शर्तें
ट्रायल इन अब्सेंटिया की प्रक्रिया शुरू करने से पहले न्यायालय को कुछ सख्त मानकों का पालन करना होगा। विभागीय सूत्रों के अनुसार, कम से कम (Successive Arrest Warrants) दो बार जारी किए जाने अनिवार्य हैं। इसके बावजूद यदि आरोपी पेश नहीं होता है, तो उसके घर पर नोटिस चस्पा करने, रिश्तेदारों को सूचित करने और स्थानीय या राष्ट्रीय समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करने के बाद ही कार्यवाही को आगे बढ़ाया जाएगा। यह सुनिश्चित करता है कि आरोपी को सूचना देने के सभी संभव प्रयास किए गए हैं।
न्याय के हित में व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट
यदि न्यायालय को लगता है कि अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति न्याय के हित में अनिवार्य नहीं है या वह बार-बार कार्यवाही में बाधा डाल रहा है, तो न्यायाधीश (Judicial Discretion Power) का उपयोग कर ट्रायल शुरू कर सकते हैं। यह प्रावधान उन गैंगस्टरों और रसूखदार अपराधियों के लिए काल साबित होगा जो अपनी गैर-मौजूदगी का फायदा उठाकर गवाहों को डराने या सबूतों को नष्ट करने की कोशिश करते हैं। अब उनकी अनुपस्थिति ही उनके खिलाफ सजा का मार्ग प्रशस्त करेगी।
आरोपी को मिलेगा पुनः सुनवाई का मौका
कानून में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह भी प्रावधान है कि यदि अभियुक्त बाद में अदालत में हाजिर होता है, तो उसे (Re-hearing Opportunities) मिल सकती है। हालांकि, यह पूरी तरह न्यायालय के विवेक पर निर्भर करेगा। इसके अलावा, फैसले के खिलाफ अपील का अधिकार भी सुरक्षित रखा गया है, लेकिन इसके लिए आरोपी का अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करना या पेश होना अनिवार्य होगा। यह संतुलन आरोपी के अधिकारों और पीड़ित के न्याय के बीच एक सेतु का काम करता है।
बिहार की उपलब्धि: देश का पहला राज्य
बिहार के अपर मुख्य सचिव, गृह विभाग, अरविंद कुमार चौधरी ने इस उपलब्धि की पुष्टि की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि (Criminal Law Reforms Implementation) के मामले में बिहार ने अग्रणी भूमिका निभाई है। राज्य में लंबित कांडों के बोझ को कम करने और अपराधियों को त्वरित सजा दिलाने के उद्देश्य से यह सख्त कदम उठाया गया है। बिहार की इस पहल के बाद अब अन्य राज्यों में भी इसी तरह के प्रावधानों को लागू करने की चर्चा तेज हो गई है।
अपराध मुक्त बिहार की ओर एक और प्रयास
इस कानून के प्रभावी होने से बिहार में अपराध नियंत्रण की दिशा में एक बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है। (Speedy Justice Delivery) के माध्यम से अपराधियों में कानून का खौफ बढ़ेगा। जब अपराधियों को पता होगा कि भागने से भी उनका पीछा नहीं छूटेगा और उनकी अनुपस्थिति में भी उन्हें उम्रकैद या फांसी जैसी सजा हो सकती है, तो वे कानून के शिकंजे से बचने के बजाय समर्पण करने को मजबूर होंगे। यह नये बिहार की एक सशक्त और न्यायपूर्ण तस्वीर पेश करता है।



