बिहार

Maternal Grief and Justice: इंसाफ की बलि चढ़ी ममता, सिस्टम की बेरुखी ने छीन ली मां की जिंदगी

Maternal Grief and Justice: बिहार के दरभंगा जिले से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। एक मां, जिसने अपने इकलौते बेटे को खोया था, अब खुद भी इस दुनिया को अलविदा कह गई। यह मामला केवल एक आत्महत्या (tragic suicide) का नहीं है, बल्कि उस बेबस मां की कहानी है जो अपने कलेजे के टुकड़े की मौत के बाद इंसाफ के लिए दर-दर भटकती रही। जब उसे लगा कि उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है, तो उसने मौत को गले लगाकर व्यवस्था के खिलाफ अपना मौन विरोध दर्ज कराया।

Maternal Grief and Justice
Maternal Grief and Justice

संदिग्ध मौत और अधूरी जांच का दर्द

मृतका की पहचान 35 वर्षीय मनीषा कुमारी के रूप में हुई है, जो समस्तीपुर जिले के पानारत की रहने वाली थीं। परिजनों के अनुसार, करीब तीन महीने पहले मनीषा के इकलौते बेटे कश्यप की एक निजी स्कूल के हॉस्टल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत (suspicious death) हो गई थी। उस घटना के बाद से ही मनीषा गहरे सदमे में थीं। उन्हें यकीन था कि उनके बेटे के साथ कुछ गलत हुआ है, लेकिन जांच की सुस्त रफ्तार और प्रशासनिक उदासीनता ने उनके घावों को और गहरा कर दिया।

ममता की बेबसी और अंतिम आत्मघाती कदम

अपने मासूम बेटे के वियोग और न्याय न मिलने की तड़प ने मनीषा को भीतर से तोड़ दिया था। वह फिलहाल दरभंगा के भटियारीसराय स्थित अपने मायके में रह रही थीं, जहां उन्होंने रविवार को जहरीला पदार्थ (poison consumption) खा लिया। जब परिजनों को इस बात की जानकारी हुई, तो घर में कोहराम मच गया। आनन-फानन में उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

अस्पताल के बिस्तर पर न्याय की आखिरी सांस

जहर खाने के बाद मनीषा की हालत बिगड़ती गई और उन्हें मंगलवार की सुबह दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (DMCH) लाया गया। वहां मेडिसिन आईसीयू में डॉक्टरों की टीम ने उन्हें बचाने की भरसक कोशिश की, लेकिन इलाज के दौरान (medical emergency) उनकी सांसें उखड़ गईं। मंगलवार को ही पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराकर परिजनों को सौंप दिया। अस्पताल परिसर में जुटी भीड़ की आंखों में व्यवस्था के प्रति गुस्सा और उस मां के लिए गहरी संवेदना साफ देखी जा सकती थी।

इकलौते चिराग के बुझने से उजड़ा संसार

मनीषा के परिजन रविशंकर ने बताया कि कश्यप उनका इकलौता सहारा था। उसकी मौत के बाद मनीषा पूरी तरह से सुध-बुध खो बैठी थीं। उन्होंने न्याय के लिए हर दरवाजे पर दस्तक दी, अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन कहीं भी उनकी सुनवाई (justice delayed) नहीं हुई। एक मां के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि वह अपने बेटे की मौत की असली वजह तक नहीं जान पाई। इसी मानसिक प्रताड़ना और अकेलेपन ने उन्हें इस खौफनाक कदम की ओर धकेला।

जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति का आरोप

परिजनों का सीधा आरोप है कि स्कूल प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन ने मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। यदि समय रहते बेटे की मौत की निष्पक्ष जांच (impartial investigation) की गई होती, तो शायद आज मनीषा जीवित होतीं। पुलिस ने इस मामले में मृतका के भांजे प्रिंस का बयान दर्ज किया है। पुलिस का कहना है कि वे सभी पहलुओं की जांच कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अब जांच का कोई मोल रह गया है जब इंसाफ मांगने वाली मां ही नहीं रही?

शोक में डूबा परिवार और प्रशासन पर सवाल

मनीषा की मौत की खबर फैलते ही उनके मायके और ससुराल, दोनों जगहों पर मातम पसर गया है। मोहल्ले के लोग बड़ी संख्या में पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे, जहां हर कोई प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा था। एक हंसता-खेलता परिवार (family tragedy) सिस्टम की भेंट चढ़ गया। अब देखना यह है कि क्या इस दोहरी मौत के बाद प्रशासन की नींद खुलती है और क्या उस मासूम कश्यप और उसकी मां को मरणोपरांत न्याय मिल पाता है।

क्या यही है हमारे समाज का असली चेहरा?

यह घटना हमारे समाज और प्रशासनिक ढांचे पर एक बड़ा धब्बा है। जब एक नागरिक को अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए और न्याय पाने के लिए अपनी जान देनी पड़े, तो वह (human rights) और लोकतंत्र की विफलता को दर्शाता है। मनीषा कुमारी की मौत एक चेतावनी है कि यदि पीड़ितों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो ऐसे कई और घर उजड़ सकते हैं। इस मामले में अब उच्च स्तरीय हस्तक्षेप की मांग तेज हो गई है।

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