FII – भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की वापसी के संकेत
FII – भारतीय शेयर बाजार में हाल के कारोबारी सत्रों के दौरान एक बार फिर विदेशी निवेशकों की सक्रियता देखने को मिली है। लगातार तेजी के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों ने शुद्ध खरीदार के रूप में बाजार में वापसी की है। बीते नौ ट्रेडिंग सत्रों में उन्होंने दो अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक मूल्य के शेयरों की खरीदारी की है। हालांकि, बाजार पर नजर रखने वाले जानकार इसे लेकर अभी किसी स्थायी रुझान की घोषणा करने से बच रहे हैं और मानते हैं कि आने वाले महीनों में तस्वीर और साफ होगी।

विदेशी निवेश से बाजार को मिला सहारा
28 जनवरी से 6 फरवरी के बीच के आंकड़ों पर नजर डालें तो विदेशी संस्थागत निवेशक छह सत्रों में शुद्ध खरीदार रहे, जबकि तीन सत्रों में हल्की बिकवाली भी दर्ज की गई। अस्थायी आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान करीब 2,223 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीद हुई। यह खरीदारी ऐसे समय में आई है, जब बाजार पहले ही रिकवरी के दौर में था और निवेशकों का भरोसा धीरे-धीरे लौटता नजर आ रहा था।
गिरावट के बाद वैल्युएशन में आया संतुलन
विश्लेषकों का मानना है कि हालिया गिरावट के बाद भारतीय शेयर बाजार के वैल्युएशन अधिक संतुलित स्तर पर आ गए हैं। सेंसेक्स और निफ्टी फिलहाल अपने एक साल आगे के अनुमानित मुनाफे के मुकाबले क्रमशः 20.5 गुना और 20.1 गुना पर कारोबार कर रहे हैं, जो उनके दीर्घकालिक औसत के काफी करीब माने जा रहे हैं। व्यापक बाजार की बात करें तो बीएसई मिडकैप 150 सूचकांक भी लगभग अपने लॉन्ग टर्म औसत के आसपास ही बना हुआ है। इस संतुलन ने विदेशी निवेशकों को दोबारा भारतीय बाजार की ओर देखने के लिए प्रेरित किया है।
एशियाई बाजारों के मुकाबले भारत की स्थिति
जानकारों के अनुसार, जापान को छोड़कर एशिया के अन्य प्रमुख बाजारों की तुलना में भारत का मूल्यांकन प्रीमियम अब फिर से अपने दीर्घकालिक औसत के करीब लौट आया है। पिछले एक दशक में चीन और कोरिया जैसे बाजारों के कमजोर प्रदर्शन के चलते भारत का प्रीमियम लगातार बढ़ा था। अब यह स्तर लगभग 40 प्रतिशत के आसपास है, जो 15 साल के औसत से बहुत अधिक अलग नहीं माना जा रहा। इसी तरह मूल्य-से-पुस्तक मूल्य के संकेतक भी स्थिरता की ओर इशारा कर रहे हैं।
आगे क्या जारी रह सकती है यह तेजी
कुछ बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक स्तर पर हालात अनुकूल रहे तो विदेशी निवेश की यह धारा आगे भी बनी रह सकती है। इसके लिए वैश्विक व्यापार में स्थिरता, घरेलू कंपनियों की कमाई में सुधार और अंतरराष्ट्रीय ब्याज दरों में नरमी जैसे कारक अहम होंगे। डॉलर के कमजोर होने की स्थिति में उभरते बाजारों की ओर पूंजी का रुख बढ़ना आमतौर पर देखा जाता है, जिससे भारत को भी लाभ मिल सकता है।
दो साल बाद बदला विदेशी निवेशकों का रुख
लगातार करीब दो वर्षों तक शुद्ध बिकवाली करने के बाद विदेशी निवेशकों के रुख में आया यह बदलाव कई वजहों से जुड़ा माना जा रहा है। भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड से जुड़े मुद्दों पर स्पष्टता बढ़ने से अनिश्चितता कम हुई है। इसके अलावा बॉन्ड यील्ड में स्थिरता और जोखिम लेने की धारणा में सुधार ने भी निवेशकों को इक्विटी बाजार की ओर आकर्षित किया है। पहले ऊंचे वैल्युएशन, कमजोर कमाई और मजबूत डॉलर जैसी वजहों से निवेश सीमित था, लेकिन हालिया गिरावट ने नई एंट्री के अवसर दिए हैं।
घरेलू निवेशकों की मजबूत मौजूदगी
इसी अवधि में घरेलू संस्थागत निवेशकों की भूमिका भी अहम रही। उन्होंने करीब 8,973 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की। घरेलू और विदेशी दोनों तरह के निवेशकों की सक्रियता का असर बाजार पर साफ दिखा, जहां सेंसेक्स और निफ्टी में तीन प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की गई। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों ने भी इस दौरान बेहतर प्रदर्शन किया और बाजार की चौड़ाई मजबूत बनी रही।
नीतिगत फैसलों और बजट का असर
बाजार से जुड़े लोगों का कहना है कि भारत-अमेरिका टैरिफ समझौते से निर्यातकों को लेकर बनी अनिश्चितता काफी हद तक दूर हुई है। इसके साथ ही हालिया केंद्रीय बजट में लंबी अवधि की ग्रोथ और बुनियादी ढांचे पर दिए गए जोर ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। रुपये की मजबूती और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों को स्थिर रखने के फैसले ने भी सकारात्मक संकेत दिए हैं। कम मुद्रास्फीति और बेहतर विकास दर का माहौल आमतौर पर शेयर बाजार के लिए अनुकूल माना जाता है।



