MiddleEastWar – होर्मुज संकट पर सहयोगियों ने भी फेरा मुंह, बढ़ रहा है तनाव…
MiddleEastWar – मध्य पूर्व में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। हालात तब और जटिल हो गए जब ईरान ने रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध कर दिया। इस मार्ग से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल और गैस की आपूर्ति होती है, ऐसे में इसका बंद होना वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल रहा है। तेल की कीमतों में तेज उछाल और बाजारों में गिरावट ने कई देशों को चिंतित कर दिया है।

संघर्ष की पृष्ठभूमि और बढ़ता तनाव
बताया जा रहा है कि फरवरी के अंत में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी, जिसे ईरान ने अपनी सुरक्षा के खिलाफ बताया। इसके जवाब में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही रोकने के लिए ड्रोन, मिसाइल और बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल किया। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है, जिससे करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन होता है।
आर्थिक असर और बढ़ती महंगाई का खतरा
इस टकराव का असर वैश्विक बाजारों पर साफ दिखने लगा है। कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। इसके चलते कई देशों में ईंधन महंगा हुआ है और महंगाई बढ़ने की आशंका गहरा गई है। शेयर बाजारों में भी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों में अस्थिरता बनी हुई है। अमेरिका समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था पर इसका दबाव महसूस किया जा रहा है।
अमेरिका की अपील और बदलता रुख
शुरुआत में अमेरिका ने इस अभियान को अकेले संभालने की बात कही थी, लेकिन हालात बिगड़ने पर उसने सहयोगियों से मदद मांगी। अमेरिकी नेतृत्व ने नाटो देशों, यूरोपीय सहयोगियों और एशियाई देशों से इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को सुरक्षित रखने के लिए सैन्य सहयोग की अपील की। साथ ही तेल आयात करने वाले देशों को भी अपनी जिम्मेदारी निभाने की बात कही गई।
सहयोगियों का स्पष्ट इनकार
हालांकि कई प्रमुख देशों ने इस अपील को ठुकरा दिया। जर्मनी, इटली, स्पेन और अन्य यूरोपीय देशों ने साफ कहा कि यह उनका युद्ध नहीं है और वे इसमें प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होंगे। जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भी सैन्य जहाज भेजने से इनकार कर दिया। कुछ देशों ने सीमित तकनीकी सहायता पर विचार जरूर किया है, लेकिन सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखी है।
नाटो और यूरोप की रणनीतिक स्थिति
यूरोपीय देशों का मानना है कि इस संघर्ष से पहले उनसे पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया था। यही कारण है कि अब वे सैन्य रूप से इसमें शामिल होने से बच रहे हैं। नाटो के दायरे से बाहर होने की वजह से भी इस मामले में सामूहिक सैन्य कार्रवाई को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। इससे गठबंधन की भूमिका और सीमाएं भी सामने आई हैं।
कूटनीति पर जोर और शांति की जरूरत
फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने इस स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सहयोगियों को अमेरिका की चिंताओं को गंभीरता से लेना चाहिए, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नाटो का स्वरूप रक्षात्मक है और वह सीधे हमले का हिस्सा नहीं बनता। उन्होंने इस संकट के समाधान के लिए कूटनीतिक प्रयासों पर जोर दिया और सुझाव दिया कि यूरोपीय देश या भारत जैसे राष्ट्र मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं।
भविष्य को लेकर अनिश्चितता बरकरार
मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि सैन्य टकराव के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर भी अस्थिरता बनी रह सकती है। अलग-अलग देशों के हितों और रणनीतियों के चलते समाधान आसान नहीं दिख रहा। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि तनाव को बढ़ने से रोका जाए और स्थिरता बहाल की जाए।