USIndiaTrade: भारत और अमेरिका के बीच व्यापार – टैरिफ में कटौती से प्रमुख भारतीय उद्योगों में तेजी आई
USIndiaTrade: सोमवार को भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों में एक अहम मोड़ आया, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने द्विपक्षीय व्यापार को लेकर किए गए नए समझौते की औपचारिक घोषणा की। उन्होंने 25 प्रतिशत के रेसिप्रोकल टैरिफ को पूरी तरह हटाने और मौजूदा आयात शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने का फैसला किया। इस कदम से भारतीय निर्यातकों, खासकर आईटी, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, सीफूड और केमिकल सेक्टर की कंपनियों के लिए कारोबारी माहौल अधिक अनुकूल होने की उम्मीद जगी है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव न केवल निर्यात लागत को कम करेगा, बल्कि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता भी बढ़ाएगा।

टैरिफ कटौती का व्यापक प्रभाव
नए शुल्क ढांचे से भारतीय उद्योगों को दोतरफा लाभ मिलने की संभावना है। एक ओर जहां निर्यातकों को कम टैक्स बोझ का फायदा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी खरीदारों के लिए भारतीय सामान अपेक्षाकृत सस्ते और आकर्षक बनेंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे ऑर्डर बुक में सुधार, मार्जिन में स्थिरता और कुछ क्षेत्रों में नई निवेश संभावनाएँ पैदा हो सकती हैं। शेयर बाजार में भी इस खबर के बाद चुनिंदा कंपनियों में सकारात्मक रुझान देखा गया।
कपड़ा और परिधान उद्योग में किसे कितना फायदा
टेक्सटाइल और गारमेंट्स क्षेत्र अमेरिका पर काफी निर्भर रहा है, इसलिए यह सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक गोकलदास एक्सपोर्ट्स का लगभग 67 प्रतिशत कारोबार अमेरिकी बाजार से जुड़ा है, जबकि पर्ल ग्लोबल के लिए यह आंकड़ा करीब 64 प्रतिशत है। वेल्सपन इंडिया का 61 प्रतिशत और हिमातसिंगा साइड का 60 प्रतिशत राजस्व अमेरिका से आता है। ट्रिडेंट का 28 प्रतिशत, वर्धमान टेक्सटाइल और एसपी अपैरल्स का लगभग 22-22 प्रतिशत, अरविंद का 14 प्रतिशत और केपीआर मिल्स का करीब 9 प्रतिशत कारोबार अमेरिका पर निर्भर बताया गया है। शुल्क घटने से इन कंपनियों की ऑर्डर क्षमता बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
सीफूड निर्यातकों के लिए नए अवसर
समुद्री खाद्य निर्यात के मामले में भी कुछ प्रमुख कंपनियाँ अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं। अवंति फूड्स का लगभग 14 प्रतिशत राजस्व अमेरिका से आता है, जबकि एपेक फ्रोजन फूड्स के लिए यह हिस्सा करीब 63 प्रतिशत है। वाटरबेस का लगभग 40 प्रतिशत कारोबार भी इसी बाजार से जुड़ा हुआ है। उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि टैरिफ राहत से कीमतों में स्थिरता आएगी और मांग में धीरे-धीरे सुधार हो सकता है।
ऑटो और ऑटो-कंपोनेंट सेक्टर की स्थिति
ऑटो और ऑटो-पार्ट्स क्षेत्र में भी कई कंपनियों की बड़ी निर्भरता अमेरिकी बाजार पर है। सोना बीएलडब्ल्यू का करीब 40 प्रतिशत, रामकृष्णा फोर्जिंग का 27 प्रतिशत और भारत फोर्ज का लगभग 25 प्रतिशत कारोबार अमेरिका से आता है। टाटा मोटर्स का 23 प्रतिशत, समवर्धन मदरसन और बालकृष्ण टायर्स का 18-18 प्रतिशत, सैन्सेरे इंजीनियरिंग का 9 प्रतिशत और अपोलो टायर्स का लगभग 3 प्रतिशत राजस्व अमेरिकी ग्राहकों से जुड़ा बताया गया है। कम टैरिफ से इन कंपनियों की लागत प्रतिस्पर्धा बेहतर होने की उम्मीद है।
केमिकल और कंज्यूमर कंपनियों पर असर
केमिकल सेक्टर में यूपीएल का करीब 20 से 25 प्रतिशत और एसआरएफ का लगभग 20 प्रतिशत कारोबार अमेरिका पर निर्भर माना जाता है। कंज्यूमर सेगमेंट में एलटी फूड्स का 39 प्रतिशत, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स का 12 प्रतिशत और केआरबीएल का करीब 10 प्रतिशत राजस्व अमेरिकी बाजार से जुड़ा हुआ है। टैरिफ में कटौती से इन कंपनियों के निर्यात मार्जिन को सहारा मिल सकता है।
आईटी सेवाओं के लिए क्या बदलेगा
प्रत्यक्ष रूप से टैरिफ कटौती का असर आईटी सेवाओं पर सीमित दिख सकता है, लेकिन बेहतर द्विपक्षीय व्यापार माहौल से विप्रो, इंफोसिस और टीसीएस जैसी कंपनियों के लिए कारोबारी भरोसा मजबूत होने की संभावना है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अमेरिकी क्लाइंट्स के साथ दीर्घकालिक अनुबंधों में स्थिरता आएगी और नए प्रोजेक्ट मिलने की संभावनाएँ बढ़ेंगी।
महीनों की बातचीत के बाद सफलता
गौरतलब है कि भारत और अमेरिका के बीच पिछले कई महीनों से व्यापार समझौते को लेकर लगातार बातचीत चल रही थी। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने शुल्क, बाजार पहुंच और निवेश से जुड़े मुद्दों पर कई दौर की चर्चा की थी। सोमवार की घोषणा को इन प्रयासों का परिणाम माना जा रहा है। इस रिपोर्ट में शामिल आंकड़े एनडीटीवी प्रॉफिट के विश्लेषण पर आधारित बताए गए हैं, जिनसे विभिन्न कंपनियों की अमेरिकी बाजार पर निर्भरता का अंदाजा मिलता है।



