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KabawValley – जानें क्या है कबाव घाटी को लेकर नेहरू पर उठे दावों की सच्चाई…

KabawValley – मणिपुर और म्यांमार से जुड़ी कबाव घाटी एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गई है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के एक बयान के बाद यह सवाल उठने लगा कि क्या देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कबाव घाटी को म्यांमार को “दान” कर दिया था। सोशल मीडिया पर किए गए इस दावे के बाद इतिहास और सीमा विवाद से जुड़े पुराने दस्तावेजों पर फिर बहस शुरू हो गई है। हालांकि उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड इस पूरे मामले को कहीं अधिक जटिल बताते हैं।

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कहां स्थित है कबाव घाटी

कबाव घाटी वर्तमान में म्यांमार के क्षेत्र में आती है। यह इलाका मणिपुर और म्यांमार की सीमा के पास चिंदविन नदी क्षेत्र में स्थित है। इतिहासकारों के अनुसार एक समय यह क्षेत्र मणिपुर के प्रभाव में माना जाता था। बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान सीमा विवाद और समझौतों के चलते इसका प्रशासनिक नियंत्रण बदल गया।

1824 से 1826 के बीच हुए एंग्लो-बर्मा युद्ध में मणिपुर ने ब्रिटिशों का साथ दिया था। युद्ध के बाद कबाव घाटी मणिपुर को वापस दी गई। लेकिन कुछ वर्षों बाद ब्रिटिश प्रशासन ने यह क्षेत्र फिर बर्मा को सौंप दिया।

ब्रिटिश काल में बदला था नियंत्रण

रिपोर्ट्स के अनुसार 1834 में ब्रिटिश सरकार ने कबाव घाटी को बर्मा प्रशासन के अधीन कर दिया था। इसके बदले मणिपुर को आर्थिक मुआवजा देने की व्यवस्था बनाई गई। उस समय यह तय हुआ कि मणिपुर दरबार को हर महीने एक निश्चित राशि दी जाएगी। यह रकम जमीन के नुकसान की भरपाई के रूप में तय की गई थी।

आजादी के बाद भी भारत सरकार यह भुगतान जारी रखती रही। बाद में भारत और बर्मा के बीच सीमा संबंधी समझौते होने के बाद यह प्रक्रिया समाप्त हो गई। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर आज भी अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आती रहती हैं।

नेहरू पर क्या लगाया गया आरोप

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया कि जवाहरलाल नेहरू ने बिना व्यापक चर्चा के कबाव घाटी को बर्मा को सौंप दिया था। कुछ राजनीतिक और सामाजिक संगठनों का भी मानना है कि भारत सरकार ने उस समय इस मुद्दे को स्थायी रूप से बंद कर दिया था।

हालांकि इतिहासकारों और सीमा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि “दान” या “गिफ्ट” जैसे शब्द राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा ज्यादा हैं। उनके अनुसार कबाव घाटी 1834 से ही बर्मा के प्रशासनिक नियंत्रण में थी और स्वतंत्र भारत के समय यह भारत के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं थी।

इतिहासकार क्या कहते हैं

कई शोध और ऐतिहासिक लेख बताते हैं कि नेहरू सरकार ने उस समय मौजूद सीमा व्यवस्था को स्वीकार किया था। इसका अर्थ यह नहीं था कि भारत के नियंत्रण वाले किसी इलाके को अचानक दूसरे देश को दे दिया गया। विशेषज्ञों के अनुसार यह ब्रिटिश काल से चली आ रही सीमा स्थिति को बरकरार रखने का फैसला था।

इंफाल आधारित कुछ शोध प्रकाशनों में भी उल्लेख मिलता है कि उस दौर में भारत और बर्मा के बीच स्थिर सीमा संबंध बनाने पर जोर दिया गया था। इसलिए इस पूरे मामले को “जमीन दान” कहना पूरी तरह सटीक नहीं माना जाता।

नोबेल पुरस्कार से जुड़ा दावा भी चर्चा में

सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में यह दावा भी सामने आया कि नेहरू ने यह फैसला नोबेल पुरस्कार पाने की इच्छा में लिया था। हालांकि अब तक ऐसा कोई आधिकारिक दस्तावेज या प्रमाण सामने नहीं आया है, जो इस दावे की पुष्टि करता हो।

मणिपुर के कुछ नेताओं ने पहले भी संसद और सार्वजनिक मंचों पर कबाव घाटी का मुद्दा उठाया है। उनका कहना रहा है कि मणिपुर ने ऐतिहासिक रूप से बड़ा क्षेत्र खोया। लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड में कहीं भी यह उल्लेख नहीं मिलता कि सीमा संबंधी निर्णय नोबेल पुरस्कार से जुड़े किसी उद्देश्य के तहत लिया गया था।

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