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MohammedRafi – जब एक रीटेक के लिए फिर स्टूडियो लौटे थे रफी साहब…

MohammedRafi – हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर की बात हो और मोहम्मद रफी का नाम न आए, ऐसा शायद ही कभी हो। अपनी मधुर आवाज और गायकी के प्रति समर्पण के लिए मशहूर रफी साहब से जुड़ी कई दिलचस्प कहानियां आज भी संगीत प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती हैं। ऐसी ही एक घटना फिल्म ‘जंजीर’ के लोकप्रिय गीत से जुड़ी है, जिसमें उन्होंने परिस्थितियां कठिन होने के बावजूद रिकॉर्डिंग पूरी की थी।

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यह किस्सा उस दौर का है जब एक गीत की रिकॉर्डिंग के दौरान दोबारा गायन को लेकर स्टूडियो में दिलचस्प स्थिति बन गई थी। बाद में रफी साहब ने जिस तरह इस चुनौती को स्वीकार किया, वह उनके पेशेवर समर्पण की मिसाल माना जाता है।

जंजीर के मशहूर गीत से जुड़ा है किस्सा

यह घटना फिल्म ‘जंजीर’ के चर्चित गीत ‘दीवाने हैं दीवानों को’ की रिकॉर्डिंग से संबंधित बताई जाती है। इस गीत को मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी। संगीत की जिम्मेदारी मशहूर जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के पास थी, जबकि गीत के बोल गुलशन बावरा ने लिखे थे।

रिकॉर्डिंग के दौरान जब प्रारंभिक संस्करण तैयार हुआ, तब टीम के अधिकांश सदस्य उससे संतुष्ट बताए जाते हैं। हालांकि लता मंगेशकर को लगा कि गीत को और बेहतर बनाया जा सकता है, इसलिए उन्होंने एक और टेक लेने की इच्छा जताई।

लता मंगेशकर चाहती थीं एक और टेक

बताया जाता है कि लता मंगेशकर हमेशा अपने काम में पूर्णता को महत्व देती थीं। रिकॉर्डिंग सुनने के बाद उन्होंने सुझाव दिया कि गीत को एक बार और रिकॉर्ड किया जाए। उस समय रफी साहब का मानना था कि गीत पहले ही अच्छी तरह रिकॉर्ड हो चुका है और दोबारा गाने की आवश्यकता नहीं है।

इसके बावजूद लता मंगेशकर अपनी राय पर कायम रहीं। संगीतकारों ने भी उनके सुझाव को स्वीकार किया और एक अतिरिक्त टेक की संभावना पर विचार शुरू हुआ। स्टूडियो का माहौल कुछ समय के लिए गंभीर हो गया, क्योंकि दोनों ही कलाकार अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज माने जाते थे।

उस समय क्यों हुई थी परेशानी

मीडिया रिपोर्ट्स और संगीत जगत में प्रचलित इस किस्से के अनुसार, रफी साहब उस दिन रोजे में थे। लंबे समय तक रिकॉर्डिंग करने के बाद वह थक चुके थे और दोबारा गाने को लेकर असहज महसूस कर रहे थे। इसी वजह से उन्होंने तत्काल रीटेक देने में कठिनाई जताई।

कहा जाता है कि रिकॉर्डिंग समाप्त होने के बाद वह स्टूडियो से निकलने लगे थे। ऐसे में उन्हें लगा कि गीत का काम पूरा हो चुका है और अब दोबारा रिकॉर्डिंग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

एक बातचीत ने बदल दिया फैसला

स्टूडियो से बाहर निकलते समय उनकी मुलाकात गीतकार गुलशन बावरा से हुई। बातचीत के दौरान गीतकार ने उन्हें बताया कि फिल्म में यह गीत किस तरह प्रस्तुत किया जाएगा और इसका महत्व क्या है। यह जानकारी सुनने के बाद रफी साहब ने गीत को नए नजरिए से देखा।

कहा जाता है कि गीत की प्रस्तुति और उसके फिल्मांकन से जुड़ी बातों ने उन्हें प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने दोबारा रिकॉर्डिंग करने का फैसला लिया और वापस स्टूडियो लौट आए।

समर्पण की मिसाल बन गया यह पल

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रफी साहब ने बिना कुछ खाए-पिए गीत का नया संस्करण रिकॉर्ड किया। उनकी मेहनत और समर्पण का परिणाम यह रहा कि गीत बाद में श्रोताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। फिल्म ‘जंजीर’ के संगीत को भी उस दौर में काफी सराहना मिली थी।

आज भी यह घटना संगीत प्रेमियों के लिए प्रेरणा का विषय मानी जाती है। यह केवल एक रिकॉर्डिंग की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के कलाकारों की कार्यशैली और अपने कला के प्रति उनकी निष्ठा का उदाहरण भी है। मोहम्मद रफी का यह समर्पण ही उन्हें भारतीय संगीत इतिहास के सबसे सम्मानित गायकों में शामिल करता है।

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