AadhaarUpdate – जन्म प्रमाणपत्र नियमों से झारखंड में प्रभावित हुए लाखों बच्चे
AadhaarUpdate – झारखंड में बच्चों के आधार कार्ड और स्कूल दाखिले से जुड़ी प्रक्रिया अब कई परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। राज्य में आधार कार्ड के लिए क्यूआर कोड और डिजिटल हस्ताक्षर वाले जन्म प्रमाणपत्र की अनिवार्यता ने लाखों बच्चों को प्रभावित किया है। पुराने प्रारूप में बने जन्म प्रमाणपत्र रखने वाले परिवारों को अब सरकारी दफ्तरों और आधार केंद्रों के लगातार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इसका असर खासतौर पर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर ज्यादा दिखाई दे रहा है।

स्कूलों में आधार की अनिवार्यता से बढ़ी परेशानी
राज्य के सरकारी और निजी स्कूलों में प्रवेश के दौरान बच्चों का आधार नंबर मांगा जा रहा है। कई निजी स्कूलों ने आवेदन प्रक्रिया में आधार विवरण को जरूरी दस्तावेजों की सूची में शामिल कर दिया है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए भी आधार बनवाना जरूरी माना जा रहा है, लेकिन दस्तावेजों की नई शर्तों के कारण बड़ी संख्या में आवेदन अटक गए हैं। आधार केंद्रों पर अब केवल वही जन्म प्रमाणपत्र स्वीकार किए जा रहे हैं जिनमें क्यूआर कोड और डिजिटल सिग्नेचर मौजूद हो।
ग्रामीण क्षेत्रों में पुरानी व्यवस्था अब भी जारी
झारखंड के कई गांवों और पंचायत क्षेत्रों में आज भी जन्म प्रमाणपत्र पारंपरिक तरीके से जारी किए जा रहे हैं। इन दस्तावेजों में डिजिटल सत्यापन की सुविधा नहीं होती। पहले ऐसे प्रमाणपत्रों के आधार पर आधार कार्ड आसानी से बन जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में नियमों में सख्ती आने के बाद स्थिति बदल गई है। अब बिना डिजिटल सत्यापन वाले दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया जा रहा, जिससे ग्रामीण परिवारों की परेशानी बढ़ गई है।
लाखों बच्चों का आधार अब भी अधूरा
सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में करीब 14 लाख बच्चों का आधार कार्ड अभी तक नहीं बन सका है। इसके अलावा लगभग 12 लाख बच्चों के आधार का सत्यापन भी लंबित है। दस्तावेजों में तकनीकी खामियों और नई प्रक्रिया की जानकारी नहीं होने के कारण कई परिवार समय पर आवेदन पूरा नहीं कर पा रहे हैं। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और सरकारी योजनाओं तक पहुंच पर पड़ रहा है।
2016 के बाद लागू हुई नई प्रणाली
राज्य में क्यूआर कोड आधारित जन्म प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था वर्ष 2016 में शुरू की गई थी। इसके बावजूद कई इलाकों में पुराने प्रारूप के प्रमाणपत्र अब भी बनाए जा रहे हैं। कई अभिभावकों को इस बदलाव की जानकारी तक नहीं है। पहले स्थानीय जनप्रतिनिधियों या पंचायत स्तर की पुष्टि पर कई काम हो जाते थे, लेकिन अब पूरी प्रक्रिया डिजिटल दस्तावेजों पर निर्भर हो गई है।
नाम सुधार और दस्तावेज संशोधन भी मुश्किल
बच्चों के दस्तावेजों में नाम, उपनाम या जन्मतिथि सुधारने की प्रक्रिया भी जटिल हो गई है। इसके लिए परिवारों को शपथ पत्र तैयार करवाना पड़ता है, फिर मजिस्ट्रेट से मंजूरी लेनी होती है। कई मामलों में अखबारों में सूचना प्रकाशित करने की प्रक्रिया भी अपनानी पड़ती है। ग्रामीण और गरीब परिवारों के लिए यह प्रक्रिया समय और खर्च दोनों के लिहाज से भारी साबित हो रही है।
शिक्षा और योजनाओं पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि आधार और जन्म प्रमाणपत्र से जुड़ी यह समस्या केवल दस्तावेजी नहीं रह गई है, बल्कि बच्चों की शिक्षा और सरकारी सुविधाओं तक पहुंच से भी जुड़ गई है। छात्रवृत्ति, बैंक खाते, स्कूल रिकॉर्ड और कई सरकारी योजनाओं में आधार की जरूरत बढ़ने से ऐसे परिवारों की चिंता लगातार बढ़ रही है, जिनके दस्तावेज अभी तक अपडेट नहीं हो पाए हैं।