Anticipatory Bail – पारिवारिक संपत्ति विवाद में अग्रिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने की अहम टिप्पणी
Anticipatory Bail – सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल पारिवारिक संपत्ति से जुड़े विवाद को आपराधिक रंग देकर या एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्शाकर किसी व्यक्ति के अग्रिम जमानत पाने के अधिकार को स्वतः समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस संबंध में झारखंड हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।

हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर
मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें एक आरोपी को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने अदालत से हस्तक्षेप की अपील की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को सही मानते हुए उसे यथावत रहने दिया।
संपत्ति विवाद और आपराधिक मामलों की सीमा
अदालत की टिप्पणी का केंद्र यह रहा कि यदि विवाद का मूल कारण पारिवारिक संपत्ति का बंटवारा या स्वामित्व संबंधी मतभेद है, तो ऐसे मामलों को बिना पर्याप्त आधार के गंभीर आपराधिक आरोपों का रूप नहीं दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने संकेत दिया कि प्रत्येक मामले की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही कानूनी प्रावधानों का उपयोग किया जाना चाहिए।
अग्रिम जमानत के अधिकार पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने रुख से यह संदेश दिया कि कानून द्वारा उपलब्ध अग्रिम जमानत जैसी राहतों को केवल आरोपों के स्वरूप के आधार पर नहीं छीना जा सकता। यदि प्रथम दृष्टया मामला पारिवारिक विवाद से जुड़ा दिखाई देता है, तो अदालतें तथ्यों और परिस्थितियों का संतुलित मूल्यांकन करेंगी।
याचिका खारिज, राहत बरकरार
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मामले में ऐसा कोई आधार नहीं है जो हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप को आवश्यक बनाता हो। इसी वजह से आरोपी की अग्रिम जमानत रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई। इसके साथ ही आरोपी को मिली राहत भी जारी रहेगी।