LiquorScam – झारखंड में कथित आबकारी घोटाले पर सियासी घमासान तेज
LiquorScam – झारखंड में कथित शराब घोटाले को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता बाबूलाल मरांडी ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मंगलवार को उन्होंने राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से मुलाकात कर पूरे मामले की केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने की मांग रखी। इस दौरान उन्होंने एक विस्तृत पत्र भी सौंपा, जिसमें कथित अनियमितताओं और जांच में देरी को लेकर चिंता जताई गई है।

राज्यपाल से मुलाकात में उठाए गए जांच के मुद्दे
राज्यपाल से बातचीत के दौरान मरांडी ने कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए इसे CBI को सौंपा जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि ACB इस मामले में जानबूझकर धीमी कार्रवाई कर रही है। उनका कहना है कि जांच एजेंसी द्वारा समय पर आरोप पत्र दाखिल नहीं करने से पूरे मामले की गंभीरता प्रभावित हुई है और इससे आरोपियों को लाभ मिला है। मरांडी ने यह भी कहा कि इस मामले में पारदर्शिता बनाए रखना बेहद जरूरी है, ताकि जनता का भरोसा कायम रह सके।
चार्जशीट में देरी से आरोपियों को मिला लाभ
मरांडी ने दावा किया कि इस मामले में गिरफ्तार किए गए कई आरोपियों को केवल इस वजह से जमानत मिल गई क्योंकि निर्धारित समयसीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं की गई। उनके अनुसार, 17 में से 14 आरोपियों को इसी कारण जमानत मिल चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि कई महीनों के बाद भी एक भी आरोप पत्र दाखिल न होना जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। इस स्थिति को उन्होंने जांच एजेंसी की गंभीर चूक बताया।
पूर्व अधिकारियों की गिरफ्तारी का भी जिक्र
इस पूरे प्रकरण में उन्होंने निलंबित आईएएस अधिकारी और तत्कालीन आबकारी सचिव विनय कुमार चौबे का विशेष उल्लेख किया। जानकारी के अनुसार, ACB ने चौबे और संयुक्त आबकारी आयुक्त गजेंद्र सिंह को पिछले वर्ष एक मामले में गिरफ्तार किया था, जो कथित मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा हुआ था। हालांकि, बाद में दोनों को अलग-अलग समय पर जमानत मिल गई, जिसमें चार्जशीट दाखिल न होना एक अहम कारण रहा।
घोटाले की राशि को लेकर बढ़ते दावे
मरांडी ने अपने पत्र में यह भी कहा कि वर्ष 2022 में बनाई गई नई आबकारी नीति के कारण राज्य को राजस्व का नुकसान हुआ। उनके अनुसार, शुरुआती अनुमान में यह मामला करीब 38 करोड़ रुपए का था, लेकिन अब यह बढ़कर 750 करोड़ रुपए से अधिक का हो गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस नीति का फायदा एक खास समूह को पहुंचाया गया, जिससे राज्य के हितों को नुकसान हुआ।
फरार आरोपी और जांच पर उठते सवाल
उन्होंने यह भी मुद्दा उठाया कि इस मामले में गिरफ्तार एक कारोबारी को ट्रांजिट बेल मिलने के बाद वह फरार हो गया, और अब तक उसकी गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। इसे लेकर भी उन्होंने जांच एजेंसी की कार्यशैली पर सवाल उठाए। मीडिया से बातचीत में मरांडी ने पूरे मामले को राज्य के संसाधनों की बड़ी क्षति बताया और कहा कि यह केवल आर्थिक मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी सवाल है।



