झारखण्ड

Recruitment Scam – दो राज्यों की पुलिस नौकरी में फर्जी पहचान पर सख्त हुआ SC

Recruitment Scam – सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में कड़ा रुख अपनाया है, जिसमें झारखंड पुलिस का एक कॉन्स्टेबल फर्जी पहचान और कथित जाली दस्तावेजों के सहारे बिहार पुलिस में भी नौकरी करता पाया गया। अदालत ने साफ कहा कि सरकारी सेवाओं में ईमानदारी और अनुशासन सर्वोपरि हैं, और धोखाधड़ी के जरिए नौकरी हासिल करने वालों के लिए किसी प्रकार की राहत की गुंजाइश नहीं हो सकती।

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हाईकोर्ट का फैसला रद्द

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें पुलिसकर्मी रंजन कुमार की बर्खास्तगी को गलत ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को सही मानते हुए कहा कि मामले में गंभीर अनुशासनहीनता और धोखाधड़ी के पर्याप्त प्रमाण मौजूद थे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस जैसी संवेदनशील सेवा में नियुक्त व्यक्ति से उच्च स्तर की सत्यनिष्ठा की अपेक्षा की जाती है। ऐसे मामलों में नरमी बरतना सार्वजनिक व्यवस्था और प्रशासनिक भरोसे को प्रभावित कर सकता है।

छुट्टी लेकर दूसरी नौकरी जॉइन करने का आरोप

रिकॉर्ड के अनुसार, रंजन कुमार की नियुक्ति 18 मई 2005 को झारखंड पुलिस में कॉन्स्टेबल पद पर हुई थी। वह धुरकी थाना क्षेत्र में रिजर्व गार्ड के रूप में कार्यरत था। दिसंबर 2007 में उसे दो दिनों की छुट्टी मंजूर हुई थी, लेकिन निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद वह वापस ड्यूटी पर नहीं लौटा।

जांच के दौरान सामने आया कि इसी दौरान उसने बिहार पुलिस में दूसरी नौकरी हासिल कर ली। आरोप है कि उसने वहां “संतोष कुमार” नाम का इस्तेमाल किया और अलग पहचान के साथ नियुक्ति प्राप्त की। इस प्रक्रिया में फर्जी प्रमाणपत्र और कथित जाली दस्तावेजों के इस्तेमाल की बात भी सामने आई।

जांच में सामने आई कई गंभीर बातें

पटना और जहानाबाद पुलिस अधिकारियों की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकला कि रंजन कुमार और संतोष कुमार एक ही व्यक्ति थे। विभागीय जांच में प्रतिरूपण, जालसाजी, धोखाधड़ी, बिना अनुमति ड्यूटी छोड़ना और सेवा नियमों के उल्लंघन जैसे आरोप सही पाए गए।

रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार पुलिस में नियुक्ति लेने के कुछ दिनों बाद उसने वहां की ड्यूटी भी बिना अनुमति छोड़ दी थी। इसके बाद दोनों राज्यों की पुलिस इकाइयों ने मामले की अलग-अलग स्तर पर जांच कराई।

सरकारी सेवा में अनुशासन पर अदालत की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकारी नौकरी में पारदर्शिता और अनुशासन अनिवार्य हैं। अदालत ने माना कि यदि कोई कर्मचारी जानबूझकर गलत पहचान और जाली दस्तावेजों का सहारा लेता है, तो यह केवल विभागीय गलती नहीं बल्कि सार्वजनिक विश्वास से जुड़ा गंभीर मामला बन जाता है।

पीठ ने यह भी कहा कि पुलिस विभाग कानून लागू करने वाली संस्था है, इसलिए वहां कार्यरत कर्मचारियों के आचरण का स्तर सामान्य सेवाओं से भी अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जरूरी है।

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