RecruitmentRelief – लैब असिस्टेंट भर्ती में अभ्यर्थियों को हाईकोर्ट से मिली राहत
RecruitmentRelief – झारखंड हाईकोर्ट ने लैब असिस्टेंट भर्ती परीक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अभ्यर्थियों के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने भर्ती विज्ञापन में जोड़ी गई उस अतिरिक्त शर्त को अमान्य करार दिया है, जिसमें उम्मीदवारों के लिए स्नातक स्तर पर संबंधित विषयों को दो या तीन वर्षों तक पढ़ना अनिवार्य किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी भर्ती विज्ञापन की शर्तें वैधानिक नियमों से ऊपर नहीं हो सकतीं।

यह फैसला जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने सुनाया। अदालत ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया झारखंड सरकार के निर्धारित सेवा नियमों के आधार पर संचालित होगी और आयोग अपने स्तर पर अतिरिक्त योग्यता नहीं जोड़ सकता।
भर्ती नियमों और विज्ञापन में था अंतर
मामला झारखंड कर्मचारी चयन आयोग द्वारा जारी लैब असिस्टेंट भर्ती विज्ञापन संख्या 01/2023 से जुड़ा है। आयोग ने 690 पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे थे। भर्ती प्रक्रिया के दौरान एक ऐसी शर्त लागू की गई, जिसमें कहा गया था कि अभ्यर्थियों ने स्नातक में भौतिकी, रसायन विज्ञान या जीव विज्ञान विषयों को कम से कम दो या तीन वर्षों तक ऑनर्स या सहायक विषय के रूप में पढ़ा हो।
कई अभ्यर्थियों को इसी आधार पर अयोग्य घोषित कर दिया गया था। इसके बाद उम्मीदवारों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस शर्त को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि राज्य सरकार के सेवा नियमों में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं दी गई है।
कोर्ट ने नियमों को माना सर्वोपरि
सुनवाई के दौरान अदालत ने झारखंड गवर्नमेंट स्कूल्स टीचर एंड नॉन-टीचिंग स्टाफ अपॉइंटमेंट एंड सर्विस कंडीशंस रूल्स, 2012 और उसमें किए गए संशोधनों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि वैधानिक नियमों में संबंधित विषयों को दो या तीन वर्षों तक पढ़ने की कोई शर्त नहीं है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी विज्ञापन की शर्तें नियमों के खिलाफ हों, तो नियमों को ही मान्य माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि आयोग भर्ती प्रक्रिया में ऐसी अतिरिक्त बाध्यता नहीं जोड़ सकता जो नियम पुस्तिका में मौजूद ही न हो।
अभ्यर्थियों की योग्यता पर फिर होगा विचार
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग को निर्देश दिया है कि वे प्रभावित अभ्यर्थियों की उम्मीदवारी पर दोबारा विचार करें। अदालत ने कहा कि योग्यता का मूल्यांकन केवल 2012 के सेवा नियमों के आधार पर किया जाए।
इसके साथ ही कोर्ट ने पहले जारी किए गए अयोग्यता नोटिस भी रद्द कर दिए हैं। अदालत ने पूरी प्रक्रिया 10 सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है ताकि अभ्यर्थियों को अनावश्यक देरी का सामना न करना पड़े।
दूसरे मामले में भी कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक अन्य मामले का भी जिक्र किया जिसमें संगीत प्रभाकर डिग्री से जुड़े अंकों के आधार पर उम्मीदवारों को अलग-अलग तरीके से देखा जा रहा था। कोर्ट ने कहा कि एक ही संस्थान से समान डिग्री प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों के बीच केवल अंक प्रणाली के बदलाव के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
अदालत ने शिक्षा विभाग के उस प्रावधान को भी मनमाना बताया, जिसके तहत वर्ष 2007 से पहले की 300 अंकों वाली डिग्री को बहाली के लिए अमान्य माना गया था।
फैसले से अभ्यर्थियों में राहत
हाईकोर्ट के इस निर्णय के बाद बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को राहत मिलने की उम्मीद है। कई उम्मीदवार लंबे समय से भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और नियमों के अनुसार चयन की मांग कर रहे थे। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।