Sand Mining – झारखंड में आज मध्यरात्रि से बालू उत्खनन पर लगेगी रोक
Sand Mining – झारखंड में मानसून के आगमन को देखते हुए बुधवार रात 12 बजे के बाद बालू खनन गतिविधियों पर अस्थायी प्रतिबंध लागू हो जाएगा। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के स्थायी निर्देशों के तहत हर वर्ष वर्षाकाल के दौरान नदियों से बालू निकासी पर रोक लगाई जाती है। इसी व्यवस्था के तहत राज्यभर में 15 अक्टूबर तक बालू खनन बंद रहेगा। इसका प्रभाव पूर्वी सिंहभूम समेत सभी जिलों में देखने को मिलेगा, जहां निर्धारित अवधि तक किसी भी घाट से नियमित खनन नहीं किया जा सकेगा।

सीमित अवधि तक ही हो सका वैध खनन
पूर्वी सिंहभूम जिले में इस वर्ष वैध रूप से बालू निकासी का कार्य बहुत कम समय तक संचालित हो पाया। जिले के कारिया मोहनपाल और स्वर्णरेखा नदी क्षेत्र स्थित कारिया मोहनपाल घाटों से 31 मई से खनन शुरू किया गया था। इसके बाद केवल 11 दिनों तक ही निर्धारित चालान व्यवस्था के तहत बालू निकासी का काम जारी रह सका।
जिला प्रशासन से जुड़े अधिकारियों के अनुसार आवश्यक अनुमतियां मिलने के बाद खनन गतिविधियों को औपचारिक रूप से शुरू किया गया था, लेकिन मानसून प्रतिबंध लागू होने के कारण अब यह प्रक्रिया अगले कुछ महीनों के लिए स्थगित हो जाएगी।
संचालन की अनुमति मिलने के बाद शुरू हुआ था कार्य
जानकारी के मुताबिक संबंधित एजेंसी को 30 मई को कंसेंट टू ऑपरेट (सीटीओ) प्राप्त हुआ था। इसके अगले दिन जिला खनन पदाधिकारी की ओर से चालान जारी किए गए, जिसके बाद नियमानुसार बालू खनन आरंभ किया गया। दोनों घाटों को मिलाकर करीब 81 हेक्टेयर क्षेत्र में बालू निकासी की अनुमति दी गई है।
खनन कार्य से जुड़ी एजेंसी ने प्रतिबंध अवधि को ध्यान में रखते हुए उपलब्ध समय में बालू का भंडारण भी शुरू कर दिया है ताकि आगामी महीनों में बाजार की मांग को कुछ हद तक पूरा किया जा सके।
अक्टूबर में फिर शुरू होगा उत्खनन
अधिकारियों के अनुसार संबंधित एजेंसी को पांच वर्षों के लिए संचालन संबंधी स्वीकृति प्राप्त है। ऐसे में मानसून प्रतिबंध समाप्त होने के बाद 16 अक्टूबर से दोबारा बालू खनन शुरू किया जा सकेगा। इससे पहले भी जिले में बालू घाटों के संचालन को लेकर लंबे समय तक प्रशासनिक और तकनीकी प्रक्रियाएं पूरी की गई थीं।
पिछले वर्ष ही पूर्वी सिंहभूम के बालू घाटों का टेंडर पूरा कर लिया गया था, लेकिन विभिन्न औपचारिकताओं और आवश्यक पर्यावरणीय अनुमतियों में देरी के कारण वास्तविक खनन कार्य शुरू नहीं हो पाया था।
अनुमति प्रक्रिया में हुई थी देरी
स्थानीय प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार एजेंसी के साथ समझौता होने के बावजूद पर्यावरणीय स्वीकृति समय पर नहीं मिलने से परियोजना की शुरुआत टलती रही। पिछले महीने उपायुक्त स्तर पर आवश्यक एकरारनामा पूरा होने के बाद भी कंसेंट टू ऑपरेट जारी होने में समय लगा, जिसके चलते मई के अंतिम सप्ताह तक इंतजार करना पड़ा।
इसी वजह से खनन सत्र अपेक्षाकृत देर से शुरू हुआ और मानसून प्रतिबंध लागू होने से पहले बहुत कम अवधि के लिए ही संचालन संभव हो सका।
नियमों में बदलाव से प्रक्रिया हुई तेज
पूर्व में बालू घाटों से संबंधित एकरारनामा खनन विभाग के स्तर पर किया जाता था। राज्य सरकार ने बाद में इस व्यवस्था में बदलाव करते हुए यह अधिकार उपायुक्तों को सौंप दिया। प्रशासन का मानना है कि इस बदलाव से कई प्रक्रियाओं में तेजी आई है और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता बढ़ी है।
हालांकि पर्यावरणीय मंजूरी और अन्य वैधानिक औपचारिकताओं के कारण कुछ परियोजनाओं में समय लगना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। आगामी खनन सत्र में इन प्रक्रियाओं को और सुगम बनाने पर भी जोर दिया जा सकता है।