GangaurPuja2026 – गणगौर पर्व पर जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
GangaurPuja2026 – हिंदू पंचांग के अनुसार गणगौर का पर्व हर साल चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है, और इस बार भी यह उत्सव पूरे श्रद्धा भाव के साथ मनाया जा रहा है। खासतौर पर राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में इस पर्व की विशेष मान्यता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है, जिन्हें क्रमशः ईसर और गौरा के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

तृतीया तिथि का समय और धार्मिक महत्व
इस वर्ष तृतीया तिथि की शुरुआत रात करीब 2 बजकर 30 मिनट पर हो चुकी है और इसका समापन रात 11 बजकर 56 मिनट के आसपास होगा। यह दिन इसलिए भी खास है क्योंकि यह चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन के साथ जुड़ा हुआ है, जब मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाती है। साथ ही, इस दिन मत्स्य जयंती भी मनाई जाती है, जो भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार से संबंधित है। इस तरह यह तिथि कई धार्मिक मान्यताओं का संगम मानी जाती है।
व्रत और पूजा का महत्व
गणगौर का व्रत मुख्य रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं। वहीं अविवाहित युवतियां भी यह व्रत अच्छे जीवनसाथी की कामना के साथ करती हैं। दिन भर व्रत रखने के बाद महिलाएं पारंपरिक तरीके से पूजा करती हैं और सामूहिक रूप से गीत गाती हैं, जो इस पर्व की खास पहचान है।
पूजा की पारंपरिक विधि
गणगौर पूजा की शुरुआत सुबह स्नान और साफ वस्त्र धारण करने से होती है। इसके बाद पूजा स्थल को साफ करके चौकी पर लाल वस्त्र बिछाया जाता है और उस पर ईसर-गौरा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कई जगहों पर मिट्टी या बालू से इनकी मूर्तियां बनाई जाती हैं, जिन्हें सजाकर पूजा की जाती है। पूजा के दौरान धूप-दीप जलाकर फूल, अक्षत, सिंदूर और सुहाग की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। इसके साथ ही फल और अन्य भोग भी चढ़ाए जाते हैं।
शुभ मुहूर्त में पूजा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुभ समय में पूजा करने से उसका फल अधिक मिलता है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त से लेकर अभिजीत, विजय और सायं काल के मुहूर्त को पूजा के लिए उपयुक्त माना जाता है। विशेष रूप से अभिजीत और विजय मुहूर्त को अधिक फलदायी माना गया है। इसलिए श्रद्धालु इन समयों में पूजा करने को प्राथमिकता देते हैं।
पूजा के बाद की परंपराएं
पूजा के समापन के बाद महिलाएं गणगौर व्रत कथा का पाठ करती हैं और शाम के समय मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है। यह विसर्जन किसी पवित्र जल स्रोत या साफ पानी में किया जाता है। इसके साथ ही पारंपरिक लोकगीत और रीति-रिवाज इस पर्व को और भी खास बनाते हैं।
पूजा सामग्री की तैयारी
इस पूजा के लिए कुछ विशेष सामग्री की आवश्यकता होती है, जिसमें ईसर-गौरा की मूर्ति, श्रृंगार का सामान, धूप-दीप, अक्षत, सिंदूर, कलश, फूल और भोग शामिल हैं। इन सभी चीजों के साथ विधिपूर्वक पूजा करने से पर्व का महत्व और बढ़ जाता है।