Anti Defection – बागी सांसदों पर लोकसभा अध्यक्ष का फैसला मानसून सत्र से पहले संभव…
Anti Defection – लोकसभा में दल-बदल से जुड़े मामलों पर जल्द अहम फैसला सामने आ सकता है। सूत्रों के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (यूबीटी) के बागी सांसदों से संबंधित याचिकाओं पर मानसून सत्र शुरू होने से पहले निर्णय ले सकते हैं। बताया जा रहा है कि इस मामले में दोनों राजनीतिक दलों और अलग हुए सांसदों के प्रतिनिधियों से चर्चा की जा चुकी है, जबकि कानूनी पहलुओं की भी विस्तार से समीक्षा जारी है।

कानूनी राय के आधार पर तैयार हो रहा निर्णय
संसदीय सूत्रों के मुताबिक, निर्णय लेने से पहले संवैधानिक विशेषज्ञों और कानूनी सलाहकारों की राय ली जा रही है। दल-बदल विरोधी कानून की व्याख्या से जुड़े पुराने फैसलों और न्यायिक मिसालों का भी अध्ययन किया जा रहा है, ताकि स्पीकर का निर्णय संविधान और कानून के अनुरूप हो। इस प्रक्रिया का उद्देश्य किसी भी संभावित कानूनी विवाद से बचना है।
टीएमसी के बागी सांसदों पर विवाद
लोकसभा चुनाव 2024 में तृणमूल कांग्रेस ने 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इनमें से एक सांसद के निधन के बाद फिलहाल एक सीट रिक्त है। इस बीच पार्टी के 20 सांसदों ने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाते हुए पश्चिम बंगाल में पंजीकृत, लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का समर्थन किया है।
इन सांसदों ने लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने और उसके साथ जुड़ने की इच्छा भी व्यक्त की है। दूसरी ओर, टीएमसी ने इन सांसदों के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई की मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष को अयोग्यता संबंधी याचिकाएं सौंपी हैं।
शिवसेना (यूबीटी) ने भी उठाया कानूनी सवाल
महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) के टिकट पर निर्वाचित नौ सांसदों में से छह सांसद बाद में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट के साथ चले गए। इस घटनाक्रम के बाद उद्धव ठाकरे गुट ने भी स्पीकर के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।
पार्टी नेताओं अनिल देसाई और अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की मांग की। उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि यदि बागी सांसदों ने कोई औपचारिक ज्ञापन दिया है तो उसकी प्रति उपलब्ध कराई जाए। सूत्रों के अनुसार, इस पर स्पीकर ने बताया कि संबंधित सांसदों की ओर से अभी तक कोई लिखित आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है।
दल-बदल कानून की व्याख्या पर जोर
टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) दोनों का कहना है कि केवल सांसदों के किसी समूह के अलग होने से उन्हें दल-बदल कानून के तहत स्वतः संरक्षण नहीं मिल जाता। उनका तर्क है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार कानूनी सुरक्षा तभी मिलती है, जब पूरी राजनीतिक पार्टी का विधिवत विलय दूसरी पार्टी में हो और निर्धारित शर्तें पूरी हों।
पार्टियों का यह भी कहना है कि केवल संसदीय दल के दो-तिहाई सदस्यों का अलग होकर किसी अन्य दल से जुड़ना, अपने आप में विलय की कानूनी मान्यता नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर दोनों दल अपने बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
संसद में बैठने की व्यवस्था में भी हो सकते हैं बदलाव
आगामी मानसून सत्र को देखते हुए लोकसभा सचिवालय सांसदों की बैठने की नई व्यवस्था पर भी विचार कर रहा है। टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) के अलग हुए सांसदों के अलावा, डीएमके ने भी सदन में अपनी सीटिंग व्यवस्था बदलने का अनुरोध किया है। पार्टी ने कांग्रेस से अलग बैठने की इच्छा जताई है, क्योंकि उसके राजनीतिक गठबंधन में हाल के समय में बदलाव हुआ है।
अब सभी की नजर लोकसभा अध्यक्ष के संभावित फैसले पर है, क्योंकि यह निर्णय न केवल संबंधित सांसदों की सदस्यता बल्कि संसद में दल-बदल कानून की व्याख्या के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।