ArmyPorterRecruitment – धारचूला में बदला पोर्टर भर्ती का स्वरूप, गायब दिखे नेपाली युवा
ArmyPorterRecruitment – हिमालयी सीमावर्ती इलाकों में भारतीय सेना के लिए बेहद अहम माने जाने वाले पोर्टर भर्ती के स्वरूप में अब स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहा है। जो काम कभी नेपाली युवाओं की भागीदारी के बिना अधूरा माना जाता था, अब उसमें उनकी मौजूदगी लगभग खत्म होती नजर आ रही है। उनकी जगह उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से बड़ी संख्या में युवा इस भर्ती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

धारचूला में भर्ती के पहले दिन दिखा बड़ा बदलाव
पिथौरागढ़ जिले के धारचूला में सोमवार से शुरू हुई पांच दिवसीय पोर्टर भर्ती के पहले ही दिन यह बदलाव साफ दिखाई दिया। सेना के अनुसार, पहले दिन एक भी नेपाली मूल का उम्मीदवार भर्ती प्रक्रिया में शामिल नहीं हुआ। यह स्थिति पहले के मुकाबले बिल्कुल अलग है, क्योंकि बीते वर्षों में सेना स्थानीय युवाओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में नेपाली नागरिकों पर निर्भर रहती थी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अब नेपाली युवाओं का इस काम के प्रति रुझान कम हो गया है। धारचूला के निवासियों के अनुसार, पहले यह काम सीमावर्ती क्षेत्रों के युवाओं के लिए एक प्रमुख रोजगार विकल्प हुआ करता था, लेकिन अब स्थिति बदल रही है।
स्थानीय और बाहरी युवाओं का बढ़ता रुझान
इस बार भर्ती में उत्तराखंड के स्थानीय युवाओं की भागीदारी भी सीमित रही। इसकी एक बड़ी वजह इस नौकरी का अस्थायी स्वरूप माना जा रहा है। छह महीने के अनुबंध पर आधारित यह काम स्थायित्व नहीं देता, जिससे स्थानीय युवा अन्य विकल्प तलाश रहे हैं।
इसके उलट, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के युवा बड़ी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं। उनके लिए यह रोजगार का एक अवसर है, भले ही यह स्थायी न हो। कई अभ्यर्थियों ने बताया कि वे लंबे समय से सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे थे, लेकिन अन्य पदों पर चयन न होने के कारण अब पोर्टर के रूप में जुड़ना चाहते हैं।
नेपाल में बढ़ते अवसरों का असर
सीमावर्ती व्यापारियों और जानकारों के मुताबिक, नेपाल के नागरिकों की भारत पर रोजगार के लिए निर्भरता अब कम हो रही है। झूलाघाट बाजार से जुड़े व्यापारियों का कहना है कि पहले हर महीने सैकड़ों नेपाली युवा काम की तलाश में भारत आते थे, लेकिन अब उनकी संख्या घट गई है।
नेपाल के स्थानीय प्रशासन से जुड़े लोगों का भी मानना है कि देश में रोजगार के अवसर बढ़े हैं। इसके अलावा, नेपाली युवा अब खाड़ी देशों और अन्य अंतरराष्ट्रीय विकल्पों की ओर भी रुख कर रहे हैं, जहां उन्हें बेहतर वेतन और सुविधाएं मिलती हैं।
विदेशी रोजगार की ओर झुकाव
नेपाल के वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, बड़ी संख्या में नेपाली युवा दुबई की सेना और पुलिस में शामिल हो रहे हैं। इसके अलावा मलेशिया और कतर जैसे देशों में भी वे रोजगार पा रहे हैं। कुछ युवा स्वरोजगार के जरिए भी अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं, जिससे पारंपरिक पोर्टर जैसे कार्यों में उनकी रुचि कम हो रही है।
भर्ती प्रक्रिया और शर्तें
भारतीय सेना की इस भर्ती में भारत के साथ-साथ नेपाल और भूटान के नागरिक भी आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए आयु सीमा 18 से 40 वर्ष निर्धारित की गई है और उम्मीदवार का शारीरिक रूप से सक्षम होना जरूरी है।
पोर्टर का मुख्य काम दुर्गम पहाड़ी इलाकों में सेना के लिए रसद और जरूरी सामान पहुंचाना होता है। यह काम जोखिम भरा और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है। चयनित उम्मीदवारों को छह महीने के अनुबंध पर रखा जाता है और उन्हें मासिक 20 से 30 हजार रुपये तक का मानदेय दिया जाता है।
युवाओं की प्रतिक्रिया
भर्ती में शामिल होने आए युवाओं का कहना है कि उन्हें रोजगार की आवश्यकता है और यही वजह है कि वे दूर-दराज से यहां पहुंचे हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से आए अभ्यर्थियों ने बताया कि वे लंबे समय से तैयारी कर रहे थे और इस अवसर को गंवाना नहीं चाहते।
कई युवाओं के लिए यह सेना से जुड़ने का एक वैकल्पिक रास्ता भी है, जो उन्हें अनुभव और भविष्य में अन्य अवसरों के लिए तैयार करता है।



