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CrimeCase – फिर ताजा हुई रंगा-बिल्ला हत्याकांड की याद…

CrimeCase – ओटीटी मंच पर आने वाली नई वेब सीरीज ‘राख’ ने देश के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में से एक रंगा-बिल्ला हत्याकांड को फिर चर्चा में ला दिया है। यह मामला 1978 में दिल्ली में हुए दो किशोर भाई-बहन के अपहरण और हत्या से जुड़ा था, जिसने उस दौर में पूरे देश को झकझोर दिया था। कई दशक बीत जाने के बाद भी यह घटना भारतीय आपराधिक इतिहास के सबसे संवेदनशील मामलों में गिनी जाती है।

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एक सामान्य शाम जो त्रासदी में बदल गई

अगस्त 1978 में नौसेना अधिकारी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा का परिवार दिल्ली के धौला कुआं इलाके में रहता था। उनकी 16 वर्षीय बेटी गीता चोपड़ा और 13 वर्षीय बेटे संजय चोपड़ा को एक कार्यक्रम के सिलसिले में आकाशवाणी केंद्र जाना था। परिवार के लिए यह एक सामान्य दिन की तरह था और बच्चों ने तय समय पर घर से निकलने की तैयारी कर ली।

रास्ते में बारिश होने के कारण दोनों ने एक वाहन से लिफ्ट ली। उन्हें शहर के एक हिस्से में उतार दिया गया, जहां से उन्हें आगे अपने गंतव्य तक पहुंचना था। लेकिन इसके बाद वे आकाशवाणी केंद्र तक नहीं पहुंचे और अचानक लापता हो गए।

परिवार की चिंता से शुरू हुई तलाश

जब निर्धारित समय पर रेडियो कार्यक्रम प्रसारित हुआ और उसमें गीता की आवाज सुनाई नहीं दी, तो परिवार को चिंता होने लगी। कैप्टन चोपड़ा स्वयं जानकारी लेने के लिए आकाशवाणी केंद्र पहुंचे। वहां पता चला कि दोनों बच्चे कभी कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे ही नहीं थे।

इसके बाद परिजनों ने रिश्तेदारों और परिचितों से संपर्क किया, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली। मामला पुलिस तक पहुंचा और बच्चों की तलाश के लिए व्यापक अभियान शुरू किया गया। उस समय यह खबर तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गई थी।

दो दिन बाद मिला दर्दनाक सच

गुमशुदगी के दो दिन बाद दिल्ली के बाहरी इलाके में एक चरवाहे को जंगल में दो शव मिले। पुलिस जांच में पुष्टि हुई कि वे गीता और संजय चोपड़ा के ही शव थे। इस खुलासे ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सामने आया कि दोनों बच्चों पर धारदार हथियार से कई बार हमला किया गया था। जांच अधिकारियों के अनुसार, दोनों ने हमलावरों का डटकर सामना किया था। उनके शरीर पर मिले घाव संघर्ष की ओर संकेत करते थे। यह घटना उस समय के सबसे चर्चित अपराध मामलों में बदल गई।

जांच ने आरोपियों तक कैसे पहुंचाया

जांच एजेंसियों ने शुरुआत से ही ऐसे सुरागों पर ध्यान केंद्रित किया, जिनसे आरोपियों की पहचान हो सके। पुलिस को संदेह था कि वारदात के दौरान अपराधियों को भी चोट लगी होगी, इसलिए अस्पतालों और अन्य संभावित स्थानों पर निगरानी बढ़ाई गई।

कुछ समय बाद कुलजीत सिंह उर्फ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला जांच के घेरे में आए। दोनों पहले से फरार चल रहे थे। सितंबर 1978 में वे एक ट्रेन में यात्रा कर रहे थे, जहां उनके व्यवहार ने सुरक्षा कर्मियों का ध्यान खींचा। पहचान संबंधी जांच के दौरान संदेह गहराया और बाद में उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया।

अदालत में चला लंबा मुकदमा

गिरफ्तारी के बाद दोनों आरोपियों के खिलाफ अपहरण और हत्या समेत कई गंभीर आरोपों में मुकदमा चलाया गया। निचली अदालत ने उपलब्ध सबूतों और गवाहों के आधार पर उन्हें दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड सुनाया।

बाद में मामला उच्च न्यायालय तक पहुंचा, लेकिन वहां भी सजा बरकरार रखी गई। सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद 31 जनवरी 1982 को दोनों दोषियों को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई। यह उस समय की सबसे चर्चित न्यायिक कार्रवाइयों में शामिल रही।

समाज पर गहरा असर छोड़ गया मामला

रंगा-बिल्ला हत्याकांड का प्रभाव केवल अदालतों और पुलिस जांच तक सीमित नहीं रहा। इस घटना के बाद देशभर में बच्चों की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं सामने आईं। कई परिवारों ने अपने बच्चों को अकेले भेजने को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी शुरू कर दी।

आज भी यह मामला भारतीय अपराध इतिहास के उन मामलों में गिना जाता है, जिसने समाज, कानून व्यवस्था और जनमानस पर गहरी छाप छोड़ी। नई वेब सीरीज के जरिए एक बार फिर यह घटना लोगों की स्मृतियों में लौट आई है।

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