DefenceBook – पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब पर अब भी रक्षा मंत्रालय की मुहर बाकी
DefenceBook – भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की चर्चित पुस्तक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर रक्षा मंत्रालय की समीक्षा प्रक्रिया अब भी पूरी नहीं हो सकी है। बीते पांच वर्षों में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की पुस्तकों को स्वीकृति मिल चुकी है, लेकिन यह पुस्तक अब भी आधिकारिक मंजूरी की प्रतीक्षा में है। हाल के महीनों में संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस मुद्दे पर चर्चा तेज रही है।

RTI से सामने आई मंजूरी प्रक्रिया की स्थिति
सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2020 से 2024 के बीच रक्षा मंत्रालय के पास कुल 35 सैन्य पुस्तकों के शीर्षक अनुमोदन के लिए भेजे गए थे। इनमें से 32 पुस्तकों को स्वीकृति दी जा चुकी है। शेष तीन पुस्तकों को उस समय लंबित बताया गया था। इनमें जनरल नरवणे की पुस्तक भी शामिल थी। यह जानकारी एक मीडिया रिपोर्ट के जरिए सामने आई है, जिसने इस मामले को फिर से चर्चा में ला दिया।
लंबित सूची से एक-एक कर हटती किताबें
RTI दस्तावेजों के मुताबिक, जिन तीन पुस्तकों को लंबित दर्शाया गया था, उनमें से दो को अब मंजूरी मिल चुकी है। पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एन.सी. विज की पुस्तक ‘अलोन इन द रिंग’ मई 2025 में प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा ब्रिगेडियर जीवन राजपुरोहित की किताब को भी रक्षा मंत्रालय की स्वीकृति मिल गई है। ऐसे में वर्तमान में जनरल नरवणे की पुस्तक ही एकमात्र ऐसी पांडुलिपि है, जो अब भी मंत्रालय के स्तर पर समीक्षा के अधीन है।
किताब के विषयवस्तु पर क्यों है खास नजर
जनरल एम.एम. नरवणे ने दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक भारतीय सेना का नेतृत्व किया। यह वही अवधि थी जब पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ तनाव अपने चरम पर था। दिसंबर 2023 में प्रकाशित इस पुस्तक के कुछ अंशों को लेकर पहले भी सुरक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक हलकों में चर्चा हो चुकी है। माना जा रहा है कि पुस्तक में उस दौर के अहम सैन्य निर्णयों और परिस्थितियों का उल्लेख है, जिन्हें संवेदनशील माना जा सकता है।
राहुल गांधी के दावे से बढ़ी सियासी हलचल
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस पुस्तक का उल्लेख करते हुए दावा किया था कि इसमें 31 अगस्त 2020 की रात की घटनाओं का जिक्र है, जब चीनी टैंक रेचिन ला क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे। उनके अनुसार, लेखक ने रक्षा मंत्री के साथ बातचीत के दौरान उत्पन्न एक बेहद चुनौतीपूर्ण स्थिति का विवरण दिया है, जिसमें तत्काल और बड़े सैन्य निर्णय लेने पड़े। इन दावों के बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया।
सरकार की सतर्कता और समीक्षा की वजह
जानकारों का मानना है कि लद्दाख गतिरोध से जुड़े सैन्य संवाद, रणनीतिक निर्णय और उच्चस्तरीय चर्चाओं का उल्लेख होने की आशंका के कारण रक्षा मंत्रालय इस पुस्तक की गहन समीक्षा कर रहा है। सैन्य नियमों के तहत सेवानिवृत्त अधिकारियों की पुस्तकों में संवेदनशील जानकारी के सार्वजनिक होने से पहले जांच अनिवार्य होती है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर कोई प्रभाव न पड़े।
अन्य सैन्य पुस्तकों को मिल चुकी है हरी झंडी
हाल के वर्षों में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की किताबों को मंत्रालय की मंजूरी मिली है। इनमें लेफ्टिनेंट जनरल एस.ए. हसनैन, मेजर जनरल जी.डी. बख्शी और लेफ्टिनेंट जनरल योगेश कुमार जोशी जैसे नाम शामिल हैं। इन उदाहरणों के चलते जनरल नरवणे की पुस्तक पर जारी देरी को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और आधिकारिक चुप्पी
इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि सरकार पूर्व सेना प्रमुख का सम्मान करती है और विपक्ष इस विषय को अनावश्यक रूप से तूल दे रहा है। दूसरी ओर, पुस्तक के प्रकाशक और रक्षा मंत्रालय दोनों ने मौजूदा स्थिति पर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि मंजूरी प्रक्रिया को पूरा होने में और कितना समय लगेगा



