ElectionCommission – महाभियोग नोटिस खारिज होने पर कांग्रेस का तंज, उठाए सवाल
ElectionCommission – मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग से जुड़ा विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में खारिज होने के बाद सियासी माहौल गरमा गया है। कांग्रेस ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए अप्रत्यक्ष रूप से सरकार और संसदीय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। पार्टी ने संकेत दिया कि विपक्ष की पहल को स्वीकार करने के परिणाम पहले भी देखने को मिले हैं, जिससे मौजूदा निर्णय पर बहस तेज हो गई है।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया में पुराना संदर्भ
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन द्वारा नोटिस अस्वीकार किए जाने के बाद कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया के माध्यम से प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इशारों में कहा कि राज्यसभा के पूर्व सभापति के साथ क्या हुआ था, यह सभी जानते हैं। उनका यह बयान पिछले वर्ष के घटनाक्रम की ओर संकेत करता है, जब तत्कालीन उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पद छोड़ दिया था। कांग्रेस इस संदर्भ के जरिए मौजूदा फैसले को लेकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करती दिखी।
193 सांसदों ने किया था प्रस्ताव का समर्थन
यह प्रस्ताव विपक्ष की ओर से व्यापक समर्थन के साथ लाया गया था। 12 मार्च को लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने संयुक्त रूप से इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए थे। कुल 193 सांसदों का समर्थन इस प्रस्ताव को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने अपने पद की निष्पक्षता बनाए नहीं रखी और कुछ फैसलों में कार्यपालिका के प्रभाव के संकेत दिखाई दिए।
लोकसभा सचिवालय ने क्या कहा
लोकसभा सचिवालय की ओर से जारी बयान में स्पष्ट किया गया कि यह प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 324(5) और 124(4) के साथ-साथ संबंधित कानूनों के तहत प्रस्तुत किया गया था। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 तथा न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 का भी उल्लेख किया गया। सचिवालय के अनुसार, सभी पहलुओं का गहन और निष्पक्ष मूल्यांकन करने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए इस नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
राज्यसभा में भी नहीं मिली मंजूरी
राज्यसभा सचिवालय ने भी इसी तरह का रुख अपनाया। जारी बुलेटिन में कहा गया कि प्रस्ताव पर विस्तार से विचार करने के बाद सभापति ने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया। सचिवालय के अनुसार, यह निर्णय विधिक प्रावधानों के अनुरूप और सभी तथ्यों के आकलन के बाद लिया गया है। इस तरह दोनों सदनों में प्रस्ताव को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला।
विपक्ष के आरोप क्या थे
विपक्षी दलों ने अपने नोटिस में मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि आयोग की कार्यप्रणाली में निष्पक्षता की कमी दिखाई दे रही है और कुछ निर्णयों में सरकार के प्रभाव की झलक मिलती है। इसके अलावा विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। विपक्ष का दावा था कि इस प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में लोगों को मतदान अधिकार से वंचित किए जाने की आशंका है।
राजनीतिक बहस तेज होने के संकेत
इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक हलकों में बहस और तेज होने की संभावना है। जहां सत्तापक्ष इस निर्णय को नियमों और प्रक्रियाओं के अनुरूप बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और सार्वजनिक विमर्श दोनों में प्रमुख बना रह सकता है।



