Forced Deportation Case: हम अपने ही देश से क्यों भागें, बांग्लादेश से वापस लौटी गर्भवती सुनाली खातून ने सुनाई रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तान…
Forced Deportation Case: नौ महीने से अधिक की गर्भवती और बेहद थकी हुई सुनाली खातून गुरुवार को अपनी कहानी सुनाते हुए बार-बार भावुक हो उठीं (human-rights)। 26 वर्षीय सुनाली की आवाज कांप रही थी। उन्होंने कहा, “मैं अंदर से टूट चुकी हूं। सबसे बुरा यह है कि सारे कागज़ दिखाने के बाद भी किसी ने हमारी नहीं सुनी।” उनकी आंखों में भय, अपमान और अविश्वास की गहरी छाप दिखाई दे रही थी।

रोहिणी में पहचान सत्यापन से शुरू हुई मुश्किलों की लंबी रात
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के पैकार गांव की रहने वाली सुनाली को जून के अंत में दिल्ली के रोहिणी इलाके में हुई पहचान-जांच की कार्रवाई के दौरान हिरासत में लिया गया (identity-verification)। एक घरेलू कामगार सुनाली ने बताया कि वह और उनके पति दानिश शेख पुलिस के सामने आधार, पैन कार्ड, राशन कार्ड—सब दस्तावेज लेकर खड़े थे। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “मैंने उसी रात व्हाट्सऐप पर ससुराल के कागज़ भी मंगवाकर दिखाए, लेकिन किसी ने कुछ नहीं माना।”
“हम भारतीय हैं”—बार-बार कहा, पर किसी ने नहीं सुनी
सुनाली ने बताया कि उन्होंने हर स्तर पर समझाने की कोशिश की (citizenship)। “हमने एक-एक कागज़ दिखाया। बार-बार कहा कि हम भारतीय हैं, बांग्लादेशी नहीं।” लेकिन उनका दावा अनसुना कर दिया गया। मामला दस्तावेजों की जांच से आगे बढ़कर पूर्वाग्रहों में उलझता गया।
48 घंटे में डिपोर्टेशन आदेश, रोहिणी से गुवाहाटी और फिर सीमा पार धकेलना
घटना के 48 घंटे बाद—26 जून को—FRRO ने डिपोर्टेशन का आदेश जारी किया (deportation)। इसके बाद पुलिस उनके रोहिणी स्थित झुग्गी से सामान उठाकर सुनाली, उनके पति और आठ वर्षीय बेटे सबीर को गुवाहाटी ले गई। गुवाहाटी से उन्हें जल्दबाजी में बांग्लादेश की सीमा पार करवा दिया गया। सबसे बड़ी बात—बंगाल में उनके परिवार को देर तक यह पता भी नहीं था कि दंपति और बच्चे के साथ क्या हुआ।
परिवार की छटपटाहट: मिसिंग केस और हाईकोर्ट की दहलीज
सुनाली के पिता भदु शेख ने 6 जुलाई 2025 को पैकार पुलिस स्टेशन में मिसिंग केस दर्ज कराया (legal-case)। तीन दिन बाद परिवार ने कलकत्ता हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस दायर किया। याचिका में कहा गया कि परिवार ने आधार, वोटर आईडी, पैन, जमीन के कागज़—सब पेश किए थे, फिर भी गर्भवती सुनाली को डिपोर्ट कर दिया गया। यह मामला प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल उठाता है।
“हम नरक में थे”—सीमा पार की जिंदगी का दर्दनाक अनुभव
सुनाली कहती हैं, “हम एक तरह के नरक में रहे। बच्चों को खिलाने के लिए पांच रुपये तक नहीं थे” (migration-crisis)। उनके पास सिर्फ एक-एक जोड़ी कपड़े थे—सुनाली की पीली कुर्ता-नीली सलवार, और बेटे की लाल टी-शर्ट। भोजन और रहने की व्यवस्था कुछ अजनबियों की दया पर निर्भर थी। उनकी आवाज में उस दर्द की झलक साफ महसूस होती है।
भारत लौटने की कोशिश पर कथित मारपीट: ‘बंगाली मुसलमान’ होने का शक
कुछ दिनों बाद वे भारत लौटने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सुनाली के अनुसार भारतीय सीमा पर उन्हें बुरी तरह पीटा गया (border-security)। उन्होंने कहा, “हमें सिर्फ इसलिए शक की नजर से देखा गया क्योंकि हम बंगाली बोलने वाले मुसलमान हैं।” यह बयान नस्ली पूर्वाग्रह और पहचान आधारित भेदभाव पर गंभीर सवाल उठाता है।
बांग्लादेश अदालत: ‘नाम तक नहीं पूछा’, थोप दिया गया मुकदमा
सुनाली को उम्मीद थी कि बांग्लादेश की अदालत में उनका नाम, पता, कारण—सब पूछा जाएगा (court-proceedings)। लेकिन मुकदमा कुछ ही मिनटों में खत्म हो गया। बिना सवाल-जवाब, उन्हें जेल भेज दिया गया। उन्होंने कहा, “हमने कहा कि हम भारत के हैं, हमारे पास कागज़ हैं… तो हम क्यों भागेंगे? वहां के लोग भी हैरान थे।”
वापसी के बाद भी मन में डर—‘क्या पता फिर बाहर धकेल दिया जाए’
आज भले ही सुनाली भारत वापस आ चुकी हैं, लेकिन उनके भीतर गहरा भय अब भी बैठा हुआ है (trauma)। उन्होंने कहा, “और कौन-से कागज़ लेकर आएं? क्या पता फिर से बाहर धकेल दिया जाए? मैं नींद नहीं ले पाती।” यह बयान बताता है कि एक बार अनुभव की गई हिंसा और अन्याय कितने लंबे समय तक मनुष्य को प्रभावित कर सकते हैं।
सुनाली की कहानी: एक नागरिक संघर्ष की चेतावनी
सुनाली का मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि नागरिक पहचान, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और मानवीय संवेदनाओं पर गहरा सवाल है (human-dignity)। यह कहानी बताती है कि दस्तावेज़ होने के बावजूद भी लोग व्यवस्था के अविश्वास और कठोरता का शिकार कैसे बन जाते हैं। सुनाली का भय, उनकी पीड़ा और संघर्ष हमें याद दिलाते हैं कि पहचान और मानवीय गरिमा के प्रश्न किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद को परिभाषित करते हैं।



