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Indian Appointment Panel Debate: SC-ST-OBC सब गायब, CIC लिस्ट पर आमने-सामने आए मोदी-राहुल

Indian Appointment Panel Debate: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की तीन सदस्यीय चयन समिति की बैठक में बुधवार को नया मुख्य सूचना आयुक्त (CIC), सूचना आयुक्त (ICs) और एक विजिलेंस कमिश्नर चुनने पर विचार किया गया (appointment)। यह बैठक कई मायनों में अहम रही, क्योंकि राहुल गांधी ने अपनी असहमति बेहद तीखे तरीके से दर्ज कराई और प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए। इस मीटिंग के राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव दूरगामी माने जा रहे हैं।

Indian Appointment Panel Debate
Indian Appointment Panel Debate

राहुल गांधी ने उठाया प्रतिनिधित्व का बड़ा मुद्दा

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल गांधी (Indian Appointment Panel Debate) ने बैठक के दौरान कहा कि शॉर्टलिस्ट की गई सूची में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व लगभग नगण्य है (representation)। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतने महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर विविधता की कमी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करती है। यह बयान भारत की सामाजिक संरचना को ध्यान में रखते हुए बेहद गंभीर माना जा रहा है।


जातीय संरचना का विवरण मिलने के बाद बढ़ी चिंता

रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी ने कई सप्ताह पहले ही सरकार से आवेदकों की जातीय संरचना की जानकारी मांगी थी (data)। बुधवार को यह विवरण समिति के सामने रखा गया, और इसमें केवल 7% आवेदक ही पिछड़े समुदायों से थे। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि शॉर्टलिस्ट में मात्र एक ही उम्मीदवार इन समुदायों से था। राहुल ने इस असमानता को “प्रणालीगत बहिष्कार” बताया और विस्तृत असहमति नोट सौंपा।


RTI कानून को कमजोर करने का आरोप

राहुल गांधी ने सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि सूचना का अधिकार कानून लगातार कमजोर किया जा रहा है (transparency)। उनका कहना था कि शॉर्टलिस्ट के कुछ उम्मीदवारों का अपने पिछले कार्यकाल में पारदर्शिता का रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाओं में SC, ST, OBC, EBC और अल्पसंख्यकों की नियुक्तियां जानबूझकर रोक दी जा रही हैं। सूत्रों के अनुसार, राहुल की आपत्तियों के बाद सीमित उपलब्ध उम्मीदवारों में से कुछ नामों पर सहमति बनी।


विपक्ष की नाराज़गी: ‘उस कमरे में मेरी कोई आवाज़ नहीं’

बैठक से एक दिन पहले ही राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा था कि चयन पैनल की बैठकों में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं रह जाती (opposition)। उन्होंने कहा, “एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह होते हैं, दूसरी तरफ नेता प्रतिपक्ष। मेरी उस कमरे में कोई आवाज नहीं। जो वे तय करते हैं वही होता है।” यह टिप्पणी केवल CIC चयन प्रक्रिया तक सीमित नहीं थी, बल्कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से भी जुड़ी थी, जिसका ढांचा इसी के समान है।


CIC पद कई महीनों से खाली, आयोग में संकट गहरा

मुख्य सूचना आयुक्त का पद 13 सितंबर से खाली है, जब तत्कालीन CIC हीरालाल समारिया रिटायर हुए थे (vacancy)। आयोग में 10 सूचना आयुक्त तक नियुक्त किए जा सकते हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 2 ही IC कार्यरत हैं। आठ पद वर्षों से खाली पड़े हैं। इससे RTI आवेदनों के निपटारे में भारी देरी हो रही है और नागरिकों के सूचना के अधिकार पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।


समारिया की पृष्ठभूमि और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर बहस

हीरालाल समारिया दलित समुदाय से आते थे और उनके रिटायरमेंट के बाद सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल और तेज हो गया है (diversity)। राहुल गांधी ने यह तर्क दिया कि संवैधानिक संस्थाओं में नियुक्तियां सामाजिक न्याय और संतुलन को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए। हालांकि सरकार का कहना है कि नियुक्तियां योग्यता आधारित होती हैं, लेकिन विपक्ष इसे आधा सच मानता है।


पहले भी उठी थी नियुक्ति प्रक्रिया पर आपत्तियाँ

यह पहली बार नहीं है जब CIC की नियुक्ति प्रक्रिया पर विवाद खड़ा हुआ हो (controversy)। 2023 में समारिया की नियुक्ति के समय विपक्षी सदस्य अधीर रंजन चौधरी ने कहा था कि सरकार ने उनसे किसी प्रकार का परामर्श नहीं किया। इससे पहले 2020 में उन्होंने पूर्व IFS अधिकारी यशवर्धन कुमार सिन्हा को CIC और पत्रकार उदय महूरकर को IC बनाए जाने का विरोध किया था। लेकिन उनकी आपत्तियों के बावजूद दोनों नियुक्तियां कर दी गईं।


सिस्टमेटिक मुद्दों पर उठ रही नई बहस

इस पूरी प्रक्रिया ने एक बार फिर इस बड़े सवाल को जन्म दिया है कि क्या भारत में संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्तियाँ राजनीतिक प्रभाव से मुक्त हैं (system)। विपक्ष का आरोप है कि सरकार चयन पैनल में बहुमत का लाभ उठाकर अपनी पसंद के उम्मीदवारों को आगे बढ़ाती है। दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि सभी चयन नियमों के अनुसार और मेरिट आधारित होते हैं।


अगले कदम और राजनीतिक महत्व

अब देखना यह होगा कि समिति की अनुशंसा के बाद सरकार किन नामों को मंज़ूरी देती है (decision)। चूंकि CIC और IC के पद लंबे समय से खाली हैं, ऐसे में नियुक्तियां जल्द होंगी, यह लगभग तय है। लेकिन राहुल द्वारा उठाए गए आरक्षण, पारदर्शिता और प्रतिनिधित्व के मुद्दे आने वाले दिनों में बड़े राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने वाले हैं। यह पूरा विवाद केवल संस्थागत नियुक्तियों का नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे और सामाजिक न्याय नीति का भी सवाल बन गया है

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