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JudiciaryCrisis – जिला अदालतों में पड़ा जजों का अकाल, बना भारी दबाव

JudiciaryCrisis – देश की जिला अदालतें लंबे समय से बढ़ते मुकदमों के दबाव से जूझ रही हैं, लेकिन हालिया सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण ने इस समस्या की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है। प्रति दस लाख आबादी पर महज 22 जजों की उपलब्धता यह संकेत देती है कि न्याय प्रणाली पर बोझ लगातार बढ़ रहा है। यह स्थिति तब है जब विधि आयोग और सर्वोच्च न्यायालय पहले ही जजों की संख्या बढ़ाने की सिफारिश कर चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संसाधनों के साथ त्वरित न्याय की अपेक्षा करना कठिन होता जा रहा है।

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जजों की स्वीकृत संख्या और रिक्त पदों की स्थिति

केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के अनुसार, देशभर की जिला अदालतों में जजों के कुल 25,439 स्वीकृत पद हैं। इनमें से करीब 5,000 पद अब भी खाली पड़े हैं। इसका सीधा असर मुकदमों के निपटारे की गति पर पड़ता है। 2011 की जनगणना के आधार पर प्रति दस लाख आबादी पर लगभग 22 जजों का औसत सामने आया था। हालांकि, वर्तमान में देश की आबादी 140 करोड़ से अधिक मानी जा रही है, ऐसे में वास्तविक अनुपात और भी कम हो सकता है।

विधि आयोग और सुप्रीम कोर्ट की सिफारिशें

यह मुद्दा नया नहीं है। विधि आयोग ने 1987 में अपनी 120वीं रिपोर्ट में प्रति दस लाख जनसंख्या पर 50 जजों की आवश्यकता बताई थी। उद्देश्य साफ था—मुकदमों का बोझ कम करना और आम लोगों को समय पर न्याय उपलब्ध कराना। बाद में 2002 में ऑल इंडिया जज एसोसिएशन बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को निर्देश दिया था कि 2007 तक इस लक्ष्य को हासिल किया जाए। लेकिन दो दशक बीत जाने के बाद भी यह लक्ष्य अधूरा है।

अंतरराष्ट्रीय तुलना में भारत की स्थिति

अगर वैश्विक स्तर पर तुलना की जाए तो भारत जज-जनसंख्या अनुपात में काफी पीछे दिखाई देता है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, चीन में प्रति दस लाख लोगों पर लगभग 300 जज हैं। अमेरिका में यह आंकड़ा करीब 150 है, जबकि कई यूरोपीय देशों में यह संख्या 220 के आसपास है। इन देशों में न्यायिक ढांचे को मजबूत करने के लिए संसाधनों और नियुक्तियों पर लगातार ध्यान दिया जाता रहा है। भारत में भी इस दिशा में प्रयास हुए हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों की तस्वीर

जहां जिला अदालतों में कमी स्पष्ट है, वहीं उच्च स्तर की अदालतों में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं कही जा सकती। सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या 34 है, जिनमें से फिलहाल 33 कार्यरत हैं। प्रति दस लाख आबादी पर यह अनुपात 0.028 है। उच्च न्यायालयों में स्वीकृत पद 1,122 हैं, लेकिन लगभग 300 पद खाली हैं। यहां प्रति दस लाख जनसंख्या पर जजों की संख्या 0.92 बताई गई है। रिक्त पदों के चलते मामलों की सुनवाई में देरी स्वाभाविक है।

प्रमुख राज्यों में जज-जनसंख्या अनुपात

राज्यों के स्तर पर स्थिति और भी असमान दिखाई देती है। बिहार में प्रति दस लाख आबादी पर 19.45 जज हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में यह संख्या 18.52 है। झारखंड में 21.43 और पश्चिम बंगाल में केवल 12.05 जज प्रति दस लाख आबादी पर उपलब्ध हैं, जो राष्ट्रीय औसत से भी कम है। दूसरी ओर, दिल्ली में यह अनुपात 53.43 है और मिजोरम में 67.44 तक पहुंच जाता है। मध्य प्रदेश में 27.92, गुजरात में 28.46, उत्तराखंड में 29.55 और असम में 15.54 जज प्रति दस लाख आबादी पर हैं। यह असंतुलन बताता है कि न्यायिक संसाधनों का वितरण राज्यों में समान नहीं है।

न्याय प्रणाली पर बढ़ते दबाव का असर

मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है और न्यायिक नियुक्तियों की गति उतनी तेज नहीं है। इसका असर आम नागरिकों पर पड़ता है, जिन्हें वर्षों तक फैसले का इंतजार करना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नियुक्तियों की प्रक्रिया को तेज किया जाए और बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाया जाए, तो लंबित मामलों में कमी लाई जा सकती है। न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जजों की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित करना समय की मांग है।

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