JudiciarySystem – कॉलेजियम व्यवस्था पर पूर्व CJI गवई का स्पष्ट रुख आया सामने
JudiciarySystem – देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई ने रविवार को न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर चल रही बहस के बीच महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में कॉलेजियम प्रणाली ही भारत के लिए सबसे उपयुक्त व्यवस्था है। यह बयान उन्होंने ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में दिया, जहां न्यायिक व्यवस्था से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।

कॉलेजियम व्यवस्था पर संतुलित दृष्टिकोण
जस्टिस गवई ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि कोई भी प्रणाली पूरी तरह निर्दोष नहीं होती और कॉलेजियम भी इससे अलग नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्षों तक इस व्यवस्था के साथ काम करने के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि फिलहाल के लिए यही प्रणाली देश की जरूरतों के अनुरूप है। उनके अनुसार, हर व्यवस्था में कुछ सीमाएं और कुछ मजबूत पहलू होते हैं, लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से कॉलेजियम ने न्यायिक स्वतंत्रता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
निर्णय प्रक्रिया में कई स्तरों की भागीदारी
पूर्व CJI ने कॉलेजियम की कार्यप्रणाली को लेकर उठने वाले सवालों पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया किसी एक व्यक्ति के निर्णय पर आधारित नहीं होती। उच्च न्यायालय स्तर पर मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीश मिलकर नामों की सिफारिश करते हैं, जिसके बाद ये प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजे जाते हैं। इसके बाद विभिन्न एजेंसियों, जिनमें खुफिया विभाग भी शामिल है, से रिपोर्ट ली जाती है और सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम अंतिम निर्णय लेता है।
सरकार और न्यायपालिका के बीच समन्वय का मुद्दा
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यदि सरकार को किसी नाम पर आपत्ति होती है, तो उसे कॉलेजियम के समक्ष रखा जाता है और उस पर विचार किया जाता है। हालांकि, उन्होंने चिंता जताई कि कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां कॉलेजियम द्वारा दोबारा सिफारिश किए जाने के बावजूद नियुक्तियां लंबित हैं। उन्होंने इसे टकराव का विषय न बताते हुए एक गंभीर संस्थागत मुद्दा बताया, जिस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
हाईकोर्ट में नियुक्तियों की कमी पर चिंता
जस्टिस गवई ने उच्च न्यायालयों में स्वीकृत पदों और वास्तविक नियुक्तियों के बीच के अंतर पर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि यदि किसी नाम की दूसरी बार सिफारिश होती है, तो कार्यपालिका को नियुक्ति करनी चाहिए। इसके बावजूद देरी होना न्यायिक व्यवस्था की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है।
जजों के ट्रांसफर और जवाबदेही पर टिप्पणी
न्यायाधीशों के स्थानांतरण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि यह संवेदनशील विषय है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में आवश्यक भी हो सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई न्यायाधीश बार-बार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अनदेखी करता है, तो क्या कॉलेजियम को निष्क्रिय रहना चाहिए या सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। उन्होंने इस संदर्भ में अधिवक्ता समुदाय की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया।
कार्यपालिका की कार्रवाई पर न्यायपालिका की भूमिका
अपने संबोधन में उन्होंने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अदालतें सामान्यतः संयम बरतती हैं, लेकिन जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है या संवैधानिक संतुलन बिगड़ता है, तब हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल संदेह के आधार पर उसकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है, तो न्यायपालिका का कर्तव्य है कि वह कानून के शासन की रक्षा करे।
न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखने की आवश्यकता
जस्टिस गवई के बयान ने एक बार फिर इस बहस को केंद्र में ला दिया है कि न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया कैसी होनी चाहिए। उनके अनुसार, मौजूदा ढांचे में सुधार की गुंजाइश जरूर है, लेकिन जब तक कोई बेहतर और संतुलित विकल्प सामने नहीं आता, तब तक कॉलेजियम प्रणाली को जारी रखना ही व्यावहारिक और सुरक्षित विकल्प है।



