राष्ट्रीय

LegalCase – सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवाद में सुनाया बड़ा फैसला, पति पर सख्ती

LegalCase – सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद में हस्तक्षेप करते हुए न सिर्फ मामले का पटाक्षेप किया बल्कि पति के व्यवहार पर कड़ी टिप्पणी भी की। अदालत ने पत्नी को एकमुश्त 5 करोड़ रुपये देने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस पूरे विवाद को असामान्य बताते हुए कहा कि अब इसे खत्म करना ही न्यायसंगत है।

supreme court marital dispute decision

लगातार मुकदमों से बढ़ा विवाद

इस मामले की जड़ में एक ऐसा वैवाहिक संबंध था जो 2010 में शुरू हुआ और 2016 तक आते-आते पूरी तरह टूट गया। अलगाव के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ता गया और स्थिति अदालतों तक पहुंच गई। खास बात यह रही कि पति, जो खुद पेशे से वकील है, ने विवाद को सुलझाने के बजाय उसे और उलझाने का रास्ता चुना।

उसने पत्नी, उसके परिवार के सदस्यों और यहां तक कि उसके वकीलों के खिलाफ भी अलग-अलग अदालतों और मंचों पर 80 से अधिक मामले दायर कर दिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यह न केवल न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव डालता है बल्कि यह व्यक्तिगत प्रतिशोध का भी संकेत देता है। अदालत ने इन सभी मामलों को एक साथ खारिज कर दिया।

अदालत की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान पीठ ने पति के रवैये को गंभीर चिंता का विषय बताया। न्यायाधीशों ने स्पष्ट कहा कि इस तरह का आचरण दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित प्रतीत होता है। अदालत ने यह भी कहा कि एक वकील होने के नाते उसे कानून का सम्मान करना चाहिए था, लेकिन उसने अपनी जानकारी का इस्तेमाल उल्टा दबाव बनाने के लिए किया।

पीठ ने इस पूरे विवाद को “वैवाहिक महाभारत” जैसा बताते हुए कहा कि यह मामला सामान्य दायरे से बहुत आगे निकल चुका है। ऐसे में न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो गया था ताकि दोनों पक्षों को राहत मिल सके और अनावश्यक मुकदमों की श्रृंखला समाप्त हो।

5 करोड़ रुपये का अंतिम निपटान

विवाद को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को 5 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि अदा करे। यह राशि केवल गुजारा भत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बच्चों के पालन-पोषण का खर्च और अब तक चले मुकदमों से जुड़े खर्च भी शामिल हैं।

अदालत ने इस भुगतान को अंतिम समझौता माना है, जिसका उद्देश्य भविष्य में किसी भी तरह के कानूनी विवाद को रोकना है। यह फैसला इस बात का भी संकेत देता है कि अदालतें अब ऐसे मामलों में निर्णायक रुख अपनाने से पीछे नहीं हट रही हैं, जहां विवाद लंबा खिंचता जा रहा हो।

बच्चों की कस्टडी पर फैसला

मामले में दो नाबालिग बच्चों की देखभाल को लेकर भी अदालत ने स्पष्ट आदेश दिए। बच्चों की पूरी कस्टडी मां को सौंप दी गई है, जबकि पिता को निर्धारित समय पर उनसे मिलने का अधिकार दिया गया है।

यह निर्णय बच्चों के हित को प्राथमिकता देते हुए लिया गया है, ताकि उनका पालन-पोषण स्थिर वातावरण में हो सके। अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि मुलाकात का अधिकार संतुलित तरीके से लागू किया जाए।

संपत्ति और भविष्य को लेकर निर्देश

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी वर्तमान में जिस फ्लैट में रह रही है, वह उसके ससुर के स्वामित्व में है। इसलिए आदेश दिया गया कि वह भुगतान प्राप्त होने के बाद ही उस फ्लैट को खाली करेगी।

इसके साथ ही पति को सख्त चेतावनी दी गई कि वह भविष्य में पत्नी, उसके परिवार या उनके वकीलों के खिलाफ कोई नया मामला दर्ज नहीं करेगा। अदालत ने साफ कहा कि यदि आदेश का उल्लंघन हुआ तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

यह फैसला केवल एक पारिवारिक विवाद का अंत नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ अदालतें सख्ती से पेश आएंगी।

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