RajyaSabha – हरिवंश के उपसभापति बनने का रास्ता साफ, विपक्ष का बहिष्कार
RajyaSabha – राज्यसभा में उपसभापति पद को लेकर स्थिति लगभग स्पष्ट हो चुकी है, जहां मनोनीत सदस्य हरिवंश का इस पद पर निर्विरोध चयन तय माना जा रहा है। गुरुवार को नामांकन की अंतिम समयसीमा समाप्त होने तक विपक्ष की ओर से कोई उम्मीदवार सामने नहीं आया। हालांकि विपक्षी दलों ने इस चुनाव में भाग नहीं लेने का निर्णय लिया है। हाल ही में हरिवंश ने 10 अप्रैल को मनोनीत सदस्य के रूप में शपथ ली थी, जिसके बाद उनका नाम इस पद के लिए आगे बढ़ाया गया।

नामांकन प्रक्रिया पूरी, मुकाबले की स्थिति नहीं बनी
सूत्रों के अनुसार, उपसभापति पद के लिए शुक्रवार को होने वाले चुनाव से पहले हरिवंश ने विधिवत नामांकन दाखिल किया। उनके पक्ष में कई प्रस्ताव भी पेश किए गए हैं। नामांकन की अंतिम समय सीमा गुरुवार दोपहर तक निर्धारित थी, लेकिन तय समय तक विपक्ष की ओर से कोई प्रस्ताव दाखिल नहीं हुआ। ऐसे में चुनाव में किसी तरह की प्रतिस्पर्धा की संभावना समाप्त हो गई है और हरिवंश का चयन लगभग तय माना जा रहा है।
समर्थन में आए कई वरिष्ठ नेता
हरिवंश के नामांकन को सत्तारूढ़ गठबंधन के कई प्रमुख नेताओं का समर्थन मिला है। जानकारी के मुताबिक, राज्यसभा में सदन के नेता जगत प्रकाश नड्डा ने उनके समर्थन में प्रस्ताव रखा, जिसे भाजपा सांसद एस. फांगनोन कोन्याक ने समर्थन दिया। इसके अलावा नितिन नवीन, बृज लाल, निर्मला सीतारमण, सुरेंद्र सिंह नागर, संजय कुमार झा, उपेंद्र कुशवाहा, जयंत चौधरी और मिलिंद मुरली देवड़ा जैसे नेताओं ने भी अलग-अलग प्रस्तावों के जरिए उनका समर्थन किया है। सभी प्रस्तावों का उद्देश्य हरिवंश को उपसभापति चुने जाने की सिफारिश करना है।
चुनाव की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ेगी
संसदीय परंपरा के अनुसार, सदन में इन प्रस्तावों को एक-एक कर प्रस्तुत किया जाएगा। यदि किसी एक प्रस्ताव को सदन की मंजूरी मिल जाती है, तो बाकी प्रस्ताव स्वतः निरस्त हो जाते हैं। संभावना जताई जा रही है कि पहला प्रस्ताव, जिसे नड्डा पेश करेंगे, ध्वनि मत से पारित हो सकता है। इसके बाद सभापति औपचारिक रूप से हरिवंश के उपसभापति चुने जाने की घोषणा करेंगे। परंपरा के तहत उन्हें सदन के आसन तक लाया जाएगा, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के एक-एक सदस्य शामिल होते हैं।
विपक्ष का बहिष्कार और उसके कारण
इस पूरे घटनाक्रम के बीच विपक्षी दलों ने चुनाव से दूरी बनाने का फैसला किया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार पर संसदीय परंपराओं की अनदेखी का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि इस निर्णय के पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं, जिनमें लोकसभा में लंबे समय से उपाध्यक्ष की नियुक्ति न होना भी शामिल है। उनके मुताबिक, यह स्थिति संसदीय व्यवस्था के लिहाज से असामान्य है।
प्रक्रिया पर उठाए गए सवाल
विपक्ष की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि हरिवंश को दूसरे कार्यकाल के समाप्त होने के तुरंत बाद मनोनीत किया गया और अब उन्हें उपसभापति पद के लिए उम्मीदवार बनाया गया है। जयराम रमेश ने यह भी कहा कि पहले कभी किसी मनोनीत सदस्य को इस पद के लिए इस तरह विचार में नहीं लिया गया। साथ ही उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि इस पूरे मामले में विपक्ष के साथ कोई व्यापक चर्चा नहीं की गई।
राजनीतिक संकेतों पर नजर
हालांकि विपक्ष ने स्पष्ट किया है कि उनका बहिष्कार व्यक्तिगत तौर पर हरिवंश के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह निर्णय एक राजनीतिक विरोध के रूप में लिया गया है। अब सबकी नजर शुक्रवार को होने वाली औपचारिक प्रक्रिया पर है, जहां हरिवंश के तीसरी बार उपसभापति बनने की घोषणा की जा सकती है।