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ReservationPolicy – पसमांदा मुसलमानों के आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगा विस्तृत आंकड़ा

ReservationPolicy – उच्चतम न्यायालय ने पसमांदा मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अहम सवाल उठाए हैं। अदालत ने यह जानना चाहा है कि मुस्लिम समुदाय के भीतर पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति क्या है और क्या पसमांदा मुसलमान ही एकमात्र ऐसे वर्ग हैं जिन्हें विशेष रूप से आरक्षण की आवश्यकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर ठोस सांख्यिकीय आधार के बिना कोई निष्कर्ष निकालना संभव नहीं होगा।

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मुस्लिम समुदाय के भीतर पिछड़े वर्गों का पूरा ब्यौरा मांगा

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता से पूछा कि मुस्लिम समाज में अन्य पिछड़े वर्गों की स्थिति क्या है। अदालत ने कहा कि पिछड़ेपन का निर्धारण केवल सामाजिक आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि आर्थिक स्थिति भी एक महत्वपूर्ण तत्व है। पीठ ने यह भी जानना चाहा कि क्या पसमांदा समुदाय को अलग श्रेणी में रखने के लिए कोई व्यापक अध्ययन किया गया है। अदालत का रुख यह संकेत देता है कि वह किसी भी वर्ग को विशेष लाभ देने से पहले समग्र आंकड़ों की समीक्षा करना चाहती है।

याचिका में उप-वर्गीकरण कर 10 प्रतिशत आरक्षण की मांग

जनहित याचिका में रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों का हवाला देते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण कर पसमांदा मुसलमानों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह समुदाय सामाजिक और शैक्षणिक रूप से अत्यंत पिछड़ा है और उसे आरक्षण का लाभ पर्याप्त रूप से नहीं मिल पा रहा है। अदालत ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि किसी एक वर्ग को अलग से आरक्षण देने का निर्णय व्यापक तथ्यों और तुलनात्मक विश्लेषण के आधार पर ही संभव है।

मुख्य न्यायाधीश के तीखे सवाल

सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने पूछा कि क्या अन्य गरीब मुसलमानों की कीमत पर केवल पसमांदा वर्ग को प्राथमिकता दी जा सकती है। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि मुस्लिम समुदाय में कुल कितने लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं और इस संबंध में याचिका में कोई विस्तृत अध्ययन क्यों प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने संकेत दिया कि केवल सामान्य दलीलों के आधार पर नीति संबंधी निर्णय नहीं लिए जा सकते। इस टिप्पणी से साफ है कि न्यायालय ठोस आंकड़ों और शोध को प्राथमिकता दे रहा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने मांगा समय

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वह उठाए गए प्रश्नों पर एक विस्तृत नोट दाखिल करेंगी। इसके बाद पीठ ने मामले को चार सप्ताह बाद फिर से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। इससे पहले अधिवक्ता ने अनुरोध किया था कि इस याचिका को आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग मानते हुए दिए गए चार प्रतिशत आरक्षण से जुड़े एक अन्य लंबित मामले के साथ जोड़ा जाए। हालांकि, इस पर अदालत ने तत्काल कोई अंतिम आदेश नहीं दिया।

पसमांदा समुदाय की दलील

याचिका में कहा गया है कि पसमांदा मुसलमान आर्थिक रूप से कमजोर हैं और उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण का वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा। दलील यह है कि उप-वर्गीकरण से इस समुदाय को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में उचित प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। दूसरी ओर, अदालत का जोर इस बात पर रहा कि किसी भी नीति परिवर्तन से पहले व्यापक सामाजिक संतुलन और संवैधानिक प्रावधानों का ध्यान रखना आवश्यक है।

आगे की सुनवाई पर नजर

अब निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां याचिकाकर्ता को अपने दावों के समर्थन में ठोस आंकड़े और अध्ययन पेश करने होंगे। यह मामला न केवल पसमांदा मुसलमानों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि आरक्षण नीति के व्यापक ढांचे पर भी असर डाल सकता है। अदालत का रुख फिलहाल सावधानीपूर्ण और तथ्यों पर आधारित निर्णय की ओर संकेत करता है।

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