RightToRecall – राज्यसभा में राघव चड्ढा ने भरी हुंकार, उठाया नया प्रस्ताव
RightToRecall – आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद में ‘राइट टू रिकॉल’ का मुद्दा उठाकर राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी है। बुधवार को शून्यकाल के दौरान बोलते हुए उन्होंने कहा कि जैसे मतदाताओं को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है, वैसे ही यदि कोई जनप्रतिनिधि अपेक्षित काम नहीं करता तो उसे कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने का अधिकार भी जनता के पास होना चाहिए। उनके इस सुझाव ने संसद और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है।

संसद में रखा गया तर्क
राज्यसभा में अपने वक्तव्य के दौरान चड्ढा ने कहा कि लोकतंत्र में जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि मतदाता केवल वोट डालकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करता, बल्कि चुने गए प्रतिनिधि की कार्यशैली पर निगरानी रखना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि जनता को किसी प्रतिनिधि से निराशा हो, तो उसे पांच साल तक इंतजार करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
चड्ढा ने कहा कि यह व्यवस्था मतदाताओं को अधिक सशक्त बनाएगी और जनप्रतिनिधियों को अपने काम के प्रति गंभीर रखेगी। उनके अनुसार, यह लोकतंत्र को कमजोर नहीं बल्कि और अधिक जवाबदेह बनाएगा।
क्या है ‘राइट टू रिकॉल’
राइट टू रिकॉल एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें मतदाता किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को उसका कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। इसके लिए एक निर्धारित कानूनी ढांचा और प्रक्रिया होती है। यदि तय संख्या में मतदाता इसके पक्ष में समर्थन देते हैं, तो संबंधित प्रतिनिधि को पद से हटाया जा सकता है।
सरल शब्दों में समझें तो यह मतदाताओं को यह अवसर देता है कि वे अपने चुने हुए नेता के प्रदर्शन से असंतुष्ट होने पर कार्रवाई कर सकें। हालांकि, इसके लिए स्पष्ट नियम, समयसीमा और प्रमाणिक आधार की आवश्यकता होती है।
संवैधानिक उदाहरणों का हवाला
अपने प्रस्ताव को मजबूत करते हुए चड्ढा ने कहा कि देश में पहले से ही राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और न्यायाधीशों को हटाने के लिए महाभियोग की व्यवस्था मौजूद है। इसके अलावा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी लाया जा सकता है। ऐसे में, जनप्रतिनिधियों के लिए भी जवाबदेही की समान व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि जब संविधान में विभिन्न पदों के लिए हटाने की प्रक्रिया निर्धारित है, तो निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए भी एक पारदर्शी और संतुलित तंत्र बनाया जा सकता है।
दुरुपयोग रोकने की बात
चड्ढा ने यह भी स्पष्ट किया कि राइट टू रिकॉल किसी के खिलाफ राजनीतिक हथियार नहीं होना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि इस व्यवस्था में सुरक्षा उपाय शामिल किए जाएं ताकि इसका दुरुपयोग न हो। उनके अनुसार, किसी प्रतिनिधि को हटाने के लिए ठोस आधार होना चाहिए और एक न्यूनतम समर्थन सीमा तय की जानी चाहिए।
उन्होंने प्रस्ताव रखा कि कम से कम 35 से 40 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन अनिवार्य हो सकता है। साथ ही, प्रतिनिधि को कार्यकाल के शुरुआती 18 महीनों का एक ‘परफॉर्मेंस पीरियड’ दिया जाना चाहिए, ताकि उसे काम करने और सुधार का पर्याप्त अवसर मिल सके।
किन देशों में लागू है यह व्यवस्था
राघव चड्ढा ने दावा किया कि अमेरिका, स्विट्जरलैंड और कनाडा सहित कई लोकतांत्रिक देशों में राइट टू रिकॉल की व्यवस्था लागू है। उन्होंने कहा कि दुनिया के 20 से अधिक देशों में इस तरह की प्रक्रिया मौजूद है। भारत में भी कुछ राज्यों की ग्राम पंचायतों में यह व्यवस्था लागू की गई है, जिनमें कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, वेनेज़ुएला, पेरू, इक्वाडोर, जापान, ताइवान और कनाडा जैसे देशों में मतदाताओं को प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार दिया गया है।
आगे की संभावनाएं
फिलहाल यह एक विचार के रूप में सामने आया है और इस पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनना बाकी है। संवैधानिक संशोधन और कानूनी प्रक्रिया के बिना इसे लागू करना संभव नहीं होगा। हालांकि, संसद में उठे इस मुद्दे ने लोकतांत्रिक जवाबदेही और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी पर नई बहस जरूर शुरू कर दी है।



