TMCCrisis – तृणमूल में बढ़ी अंदरूनी खींचतान, नए गुट ने बनाई अलग राह
TMCCrisis – पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभरा नया विवाद अब खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी के कुछ विधायकों के एक समूह ने सांसद और वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी से दूरी बनाने का फैसला किया है। इस गुट का नेतृत्व कर रहे नए नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने संकेत दिया है कि उनके राजनीतिक समूह की गतिविधियों में अभिषेक बनर्जी की कोई भूमिका नहीं होगी। बताया जा रहा है कि इस कदम को कई विधायकों का समर्थन भी प्राप्त है, जिससे पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों की चर्चा तेज हो गई है।

चुनावी झटके के बाद बढ़ी संगठनात्मक चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हालिया चुनावी प्रदर्शन के बाद पार्टी के भीतर असंतोष के स्वर अधिक मुखर हुए हैं। तृणमूल कांग्रेस पहले से ही संगठनात्मक स्तर पर चुनौतियों का सामना कर रही थी और अब यह नया घटनाक्रम नेतृत्व और विधायक समूह के बीच बढ़ती दूरी की ओर इशारा कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार, कई विधायक पार्टी की कार्यप्रणाली और कुछ निर्णयों को लेकर असहमति जता रहे हैं। यही वजह है कि अब पार्टी के भीतर अलग राजनीतिक रुख अपनाने वाले नेताओं की संख्या बढ़ती दिखाई दे रही है।
ममता बनर्जी के नेतृत्व पर नहीं उठे सवाल
नए गुट से जुड़े नेताओं ने स्पष्ट किया है कि उनका विवाद पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी से नहीं है। उनका कहना है कि वे अब भी ममता बनर्जी को अपना सर्वोच्च नेता मानते हैं और उनके नेतृत्व पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि विधायक दल से जुड़े मामलों में अभिषेक बनर्जी की भूमिका को स्वीकार करने के लिए वे तैयार नहीं हैं। विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए पत्र में भी इसी प्रकार का रुख सामने आया है। इस कदम को पार्टी के भीतर नेतृत्व संरचना को लेकर उभर रहे मतभेदों के रूप में देखा जा रहा है।
पत्र की वैधता को लेकर पार्टी ने जताई आपत्ति
तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक नेतृत्व ने इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का कहना है कि विधानसभा अध्यक्ष को दी गई सूचना निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं भेजी गई। नेतृत्व का दावा है कि ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी पार्टी के अधिकृत माध्यम और आधिकारिक दस्तावेजों के जरिए ही दी जानी चाहिए।
पार्टी से जुड़े नेताओं का तर्क है कि संगठनात्मक फैसलों की जानकारी देने का अधिकार केवल अधिकृत नेतृत्व के पास होता है। ऐसे में नए गुट के दावों की वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
हस्ताक्षर विवाद के बाद तेज हुआ टकराव
बताया जा रहा है कि मौजूदा विवाद की शुरुआत एक प्रस्ताव से हुई थी, जिसे विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा गया था। इस प्रस्ताव में कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। आरोप लगाए गए कि दस्तावेज में कुछ हस्ताक्षर वास्तविक नहीं थे।
मामला सामने आने के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज की गई और जांच एजेंसियों ने इसकी जांच शुरू कर दी। इसके बाद पार्टी के भीतर पहले से चल रहा असंतोष और अधिक खुलकर सामने आने लगा।
समर्थन के दम पर अलग पहचान का दावा
ऋतब्रत बनर्जी और उनके समर्थक नेताओं ने विधानसभा अध्यक्ष को बड़ी संख्या में विधायकों के समर्थन से जुड़े दस्तावेज सौंपे हैं। उनका दावा है कि उन्हें पर्याप्त समर्थन हासिल है और इसी आधार पर वे अपनी राजनीतिक वैधता प्रस्तुत कर रहे हैं।
विद्रोही गुट का कहना है कि विधानसभा के भीतर उनका समूह पर्याप्त संख्याबल रखता है और वह अपने राजनीतिक रुख को लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ा रहा है। दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व इस दावे को चुनौती दे रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में विधानसभा और संगठन दोनों स्तरों पर इस विवाद की दिशा पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।