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TransgenderRights – राजस्थान हाई कोर्ट का अहम फैसला, ट्रांसजेंडरों को अतिरिक्त वेटेज

TransgenderRights – राजस्थान हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में उन्हें 3 प्रतिशत अतिरिक्त अंकों का वेटेज देने का निर्देश दिया है। अदालत ने माना कि केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी में शामिल कर देना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इससे इस समुदाय को वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा था। यह आदेश तब तक लागू रहेगा, जब तक राज्य सरकार इस दिशा में नई और व्यापक नीति तैयार नहीं कर लेती।

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अदालत ने क्यों उठाया यह कदम

जोधपुर स्थित हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि मौजूदा व्यवस्था ट्रांसजेंडर समुदाय की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े इस वर्ग को केवल OBC श्रेणी में शामिल करना एक औपचारिक कदम भर है, जिससे उन्हें व्यावहारिक लाभ नहीं मिल रहा। इसी आधार पर न्यायालय ने अंतरिम राहत के तौर पर अतिरिक्त वेटेज देने का फैसला सुनाया।

याचिका के आधार पर आया फैसला

यह आदेश गंगा कुमारी द्वारा दायर याचिका पर सुनाया गया, जिसमें राज्य सरकार की 2023 की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मौजूदा नीति के कारण ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को आरक्षण का वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है। अदालत ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए माना कि इस वर्ग के लिए अलग दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

शिक्षा और रोजगार में नई दिशा

अदालत के निर्देश के अनुसार, ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को अब सरकारी भर्तियों और शैक्षणिक प्रवेश प्रक्रियाओं में 3 प्रतिशत अतिरिक्त अंक दिए जाएंगे। इससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत होगी और अवसरों तक उनकी पहुंच आसान बनेगी। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यह कदम एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य तत्काल राहत प्रदान करना है।

उच्च स्तरीय समिति गठित करने के निर्देश

फैसले के साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करे। यह समिति ट्रांसजेंडर समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का विस्तृत अध्ययन करेगी और उनके लिए उपयुक्त आरक्षण व्यवस्था का सुझाव देगी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर सरकार को आगे की नीति तय करनी होगी।

आरक्षण व्यवस्था को लेकर उठे सवाल

याचिका में यह भी कहा गया था कि वर्तमान व्यवस्था के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को एक कठिन विकल्प का सामना करना पड़ता है। यदि वे पहले से किसी आरक्षित वर्ग से आते हैं, तो उन्हें तय करना होता है कि वे अपने पारंपरिक आरक्षण का लाभ लें या ट्रांसजेंडर श्रेणी का। इस स्थिति में उन्हें कोई अतिरिक्त फायदा नहीं मिल पाता, जिससे नीति का उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा।

आगे की नीति पर नजर

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समिति की सिफारिशों के बाद राज्य सरकार को ठोस और प्रभावी निर्णय लेना होगा। इस फैसले को ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में अधिक समावेशी नीतियों का रास्ता खोल सकता है। फिलहाल, यह अंतरिम व्यवस्था इस समुदाय को तत्काल राहत देने की दिशा में एक सकारात्मक पहल के रूप में देखी जा रही है।

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