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TamilNaduPolitics – ओ पनीरसेल्वम ने थामा डीएमके का दामन

TamilNaduPolitics – तमिलनाडु की राजनीति में शुक्रवार को एक अहम मोड़ आया, जब पूर्व मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम ने मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन की मौजूदगी में द्रविड़ मुनेत्र कषगम की सदस्यता ग्रहण की। कभी अन्नाद्रमुक की दिवंगत नेता जे. जयललिता के करीबी रहे पनीरसेल्वम का यह कदम राज्य की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर को नया आयाम दे सकता है। तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके पनीरसेल्वम को वर्ष 2022 में अन्नाद्रमुक से निष्कासित कर दिया गया था, जिसके बाद से वे अलग राह पर थे।

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जयललिता के भरोसेमंद से अलग पहचान तक

पनीरसेल्वम लंबे समय तक जयललिता के विश्वस्त सहयोगी माने जाते थे। 2016 में उनके निधन के बाद पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष तेज हुआ। शुरुआती दौर में उन्होंने वी. के. शशिकला का समर्थन किया, लेकिन परिस्थितियां बदलीं और उन्होंने सार्वजनिक रूप से विरोध का रास्ता चुना। उस समय का उनका रुख राज्य की राजनीति में बड़े घटनाक्रम के रूप में देखा गया।

हालांकि, इस विद्रोह के बाद उनकी राजनीतिक पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होती गई। दूसरी ओर एडप्पडी के. पलानीस्वामी ने संगठन और सरकार दोनों पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली, जिससे पनीरसेल्वम हाशिये पर चले गए।

सीमित विकल्पों के बीच नया निर्णय

हाल के आम चुनावों में अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद पनीरसेल्वम के सामने विकल्प सीमित थे। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा थी कि वे किसी उभरते दल के साथ जा सकते हैं या फिर सत्तारूढ़ दल के साथ नई शुरुआत कर सकते हैं। अंततः उन्होंने डीएमके का रास्ता चुना।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य से जुड़ा नहीं है, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों की रणनीति से भी संबंधित है। डीएमके पहले से सत्ता में है और संगठनात्मक रूप से मजबूत मानी जाती है।

संभावित संवैधानिक भूमिका की चर्चा

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि डीएमके दोबारा सत्ता में आती है तो पनीरसेल्वम को विधानसभा अध्यक्ष जैसे पद की जिम्मेदारी दी जा सकती है। हालांकि इस बारे में आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ऐसी संभावना को एक सम्मानजनक भूमिका के तौर पर देखा जा रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री के लिए यह पद संवैधानिक गरिमा के साथ-साथ सक्रिय राजनीतिक भूमिका भी सुनिश्चित कर सकता है। जानकारों का कहना है कि इस तरह का प्रस्ताव दोनों पक्षों के लिए संतुलित व्यवस्था साबित हो सकता है।

दक्षिणी जिलों में समीकरण

पनीरसेल्वम मुक्कुलाथोर समुदाय से आते हैं, जिसका दक्षिण तमिलनाडु में प्रभाव माना जाता है। डीएमके को इस क्षेत्र में परंपरागत रूप से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता रहा है। ऐसे में उनके शामिल होने से पार्टी को वहां संगठनात्मक मजबूती मिलने की उम्मीद है।

उनके साथ उनके पुत्र पी. रवींद्रनाथ कुमार और कुछ समर्थक नेता भी डीएमके में आए हैं। इससे कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में नए समीकरण बनने की संभावना जताई जा रही है।

पार्टी के भीतर समायोजन की चुनौती

हालांकि, यह बदलाव पूरी तरह सहज नहीं माना जा रहा। डीएमके के कई स्थानीय कार्यकर्ता वर्षों से पनीरसेल्वम के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे हैं। अब उन्हें सहयोगी के रूप में स्वीकार करना संगठन के लिए एक चुनौती हो सकता है।

पार्टी नेतृत्व ने संकेत दिया है कि प्राथमिक लक्ष्य चुनावी सफलता है और उसके बाद सभी को संतुलित तरीके से जिम्मेदारियां दी जाएंगी। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह राजनीतिक समीकरण किस तरह आकार लेता है और राज्य की चुनावी दिशा पर इसका कितना प्रभाव पड़ता है।

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