TribalRights – लाल किला मैदान में आदिवासी समागम, एसटी दर्जे पर उठी मांग
TribalRights – नई दिल्ली के लाल किला मैदान में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए आदिवासी समुदायों का बड़ा सांस्कृतिक आयोजन आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में हजारों लोगों ने हिस्सा लिया और आदिवासी परंपराओं, संस्कृति तथा संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। आयोजन ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ की ओर से किया गया था, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा संगठन माना जाता है।

एसटी दर्जे को लेकर उठी प्रमुख मांग
कार्यक्रम के दौरान मंच से उन आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति सूची से बाहर करने की मांग दोहराई गई, जिन्होंने ईसाई या इस्लाम धर्म अपना लिया है। आयोजकों का कहना था कि यह विषय लंबे समय से आदिवासी संगठनों के बीच चर्चा का हिस्सा रहा है और अब इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
संगठन के प्रतिनिधियों ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 342 में आवश्यक संशोधन के जरिए इस मांग को लागू करने की दिशा में पहल की जानी चाहिए। उनका दावा था कि धार्मिक परिवर्तन के बाद जनजातीय पहचान और पारंपरिक सामाजिक संरचना प्रभावित होती है।
कार्तिक उरांव के दौर का किया गया जिक्र
समागम में वक्ताओं ने पूर्व आदिवासी नेता और कांग्रेस सांसद रहे कार्तिक उरांव का भी उल्लेख किया। आयोजकों के अनुसार, उन्होंने 1960 के दशक के अंत में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने यह मुद्दा उठाया था। बताया गया कि 1967 और 1970 में भी इस विषय पर ज्ञापन दिए गए थे, जिनमें धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों के एसटी दर्जे की समीक्षा की मांग की गई थी।
कार्यक्रम में कहा गया कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।
सांस्कृतिक यात्राओं के साथ शुरू हुआ आयोजन
इस बड़े समागम की शुरुआत दिल्ली के विभिन्न हिस्सों से निकाली गई सांस्कृतिक शोभायात्राओं के साथ हुई। राजघाट चौक, रामलीला मैदान, अजमेरी गेट, कुदसिया बाग और शास्त्री पार्क जैसे इलाकों से अलग-अलग समूह पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ लाल किला मैदान पहुंचे।
रैलियों के दौरान आदिवासी युवाओं ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए और लोक वाद्ययंत्रों के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया। पूरे आयोजन में विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक विविधता स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
कई राज्यों से पहुंचे प्रतिनिधि
इस समागम में असम, झारखंड, बिहार, ओडिशा, त्रिपुरा और अंडमान-निकोबार सहित कई राज्यों के आदिवासी संगठनों ने भाग लिया। आयोजकों का दावा था कि यह देश के सबसे बड़े आदिवासी सांस्कृतिक आयोजनों में से एक रहा।
पूर्वोत्तर क्षेत्र से आए प्रतिनिधियों ने आदिवासी समाज की पारंपरिक पहचान और संस्कृति को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक सामाजिक बदलावों के बीच समुदायों की मूल सांस्कृतिक जड़ों को बचाए रखना महत्वपूर्ण है।
संवैधानिक और सामाजिक बहस तेज
इस आयोजन के बाद अनुसूचित जनजाति दर्जे और धर्म परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर नई बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विषय संवैधानिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से काफी संवेदनशील है। फिलहाल सरकार की ओर से इस मांग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
आयोजकों ने कहा कि आने वाले समय में इस विषय पर देशभर में और जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे। वहीं कई सामाजिक संगठनों का मानना है कि इस तरह के मुद्दों पर व्यापक संवाद और कानूनी स्पष्टता जरूरी है।