RapeCase – शादी के वादे से जुड़े मामले पर हाईकोर्ट ने की अहम टिप्पणी
RapeCase – इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल विवाह का वादा पूरा न होने भर से किसी मामले को स्वतः दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में यह देखना आवश्यक है कि क्या शुरुआत से ही विवाह का आश्वासन धोखे की मंशा से दिया गया था या नहीं। इसी आधार पर न्यायालय ने एक आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने सुनाया। अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और मामले के तथ्यों का अध्ययन करने के बाद पाया कि यह मामला दो वयस्क व्यक्तियों के बीच लंबे समय तक चले संबंध से जुड़ा प्रतीत होता है, जो बाद में विवाद में बदल गया।
वर्ष 2019 में दर्ज हुई थी शिकायत
मामले की शुरुआत वर्ष 2019 में हुई थी, जब प्रयागराज के कर्नलगंज थाने में एक महिला ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने विवाह का आश्वासन देकर कई वर्षों तक शारीरिक संबंध बनाए। इसके साथ ही मारपीट, धमकी और अन्य आरोप भी लगाए गए थे।
एफआईआर के आधार पर पुलिस ने जांच शुरू की और बाद में मामले में आरोपपत्र भी दाखिल किया गया।
अदालत ने संबंधों की अवधि पर दिया ध्यान
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि दोनों पक्ष कई वर्षों तक एक-दूसरे के संपर्क में रहे थे। रिकॉर्ड के अनुसार उनके बीच लगभग पांच वर्षों तक संबंध बने रहे। न्यायालय ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि शिकायत में कथित घटनाओं की परिस्थितियों, समय और स्थान का विस्तृत उल्लेख नहीं था।
अदालत ने यह भी देखा कि इतने लंबे समय तक किसी प्रकार की औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला आपसी सहमति से बने संबंधों का प्रतीत होता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का लिया गया संदर्भ
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न पूर्व निर्णयों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि हर ऐसा मामला, जिसमें विवाह बाद में न हो सके, उसे दुष्कर्म के अपराध के रूप में नहीं देखा जा सकता।
न्यायालय के अनुसार अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होता है कि विवाह का वादा शुरुआत से ही असत्य था और उसी आधार पर सहमति प्राप्त की गई थी। यदि ऐसा स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होता, तो केवल संबंधों के बाद विवाह न होने को आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता।
विवाह होने का तथ्य भी रहा महत्वपूर्ण
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद दोनों पक्षों का विवाह हो गया था। अदालत ने इस पहलू को भी मामले के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि उपलब्ध परिस्थितियां इस संभावना की ओर संकेत करती हैं कि शिकायत दर्ज कराने के पीछे विवाह को लेकर दबाव बनाने का उद्देश्य भी हो सकता था। हालांकि अदालत ने अपना निर्णय रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर ही दिया।
चार्जशीट और समन आदेश रद्द
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से दुष्कर्म का प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता। अदालत ने माना कि मुकदमे की कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का अनुचित उपयोग होगा।
इसी आधार पर न्यायालय ने मामले में दाखिल चार्जशीट, संज्ञान आदेश और संबंधित आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने का आदेश दिया।