DisasterRisk – उत्तराखंड के संवेदनशील गांवों में विस्थापन की चुनौती बरकरार
DisasterRisk – उत्तराखंड के कई पहाड़ी गांव आज भी भूस्खलन, भू-धंसाव और बाढ़ जैसे प्राकृतिक खतरों की जद में हैं। राज्य के सीमांत और पर्वतीय जिलों में लगातार बढ़ते भूगर्भीय संकट के बीच सरकार विस्थापन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में जुटी है, लेकिन कई इलाकों में यह काम अब भी धीमी रफ्तार से चल रहा है। प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों को सुरक्षित स्थान पर बसाने के साथ उनकी आजीविका और सामाजिक पहचान को बनाए रखना है।

राज्य के कई जिलों में संवेदनशील गांवों की पहचान की जा चुकी है। कुछ स्थानों पर परिवारों को सुरक्षित जगहों पर बसाया गया है, जबकि कई गांव अब भी विस्थापन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर सहमति और भूगर्भीय रिपोर्ट में देरी के कारण कई योजनाएं अटकी हुई हैं।
उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में बढ़ा खतरा
उत्तरकाशी जिले में बड़ी संख्या में गांवों को अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। बीते वर्षों में यहां कई परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया, लेकिन अभी भी दर्जनों परिवार ऐसे हैं जो खतरे के बीच रह रहे हैं। पहाड़ी दरारें, लगातार खिसकती जमीन और बारिश के दौरान बढ़ते जोखिम ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है।
पिथौरागढ़ में भी स्थिति गंभीर मानी जा रही है। प्रशासन ने यहां सैकड़ों परिवारों के पुनर्वास का लक्ष्य तय किया था। बड़ी संख्या में लोगों को नए स्थानों पर बसाया जा चुका है, लेकिन कुछ परिवार अब भी अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह इलाका भूकंपीय और भूस्खलन दोनों दृष्टियों से संवेदनशील है।
रुद्रप्रयाग और चमोली में जारी है प्रक्रिया
रुद्रप्रयाग जिले के कई गांवों को आपदा संभावित माना गया है। प्रशासन ने वर्षों में कई परिवारों का पुनर्वास कराया है, लेकिन कुछ गांव अब भी सूची में बने हुए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के मौसम में हालात और ज्यादा भयावह हो जाते हैं।
चमोली और नई टिहरी के कुछ क्षेत्रों में भी विस्थापन की कार्रवाई चल रही है। कुछ जगहों पर ग्रामीणों और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय होने से प्रक्रिया तेज हुई है, जबकि कुछ इलाकों में जमीन चयन और पुनर्वास स्थल को लेकर विवाद बने हुए हैं।
अल्मोड़ा और नैनीताल में अटकी योजनाएं
अल्मोड़ा जिले के कई गांवों में भूगर्भीय खतरे की पुष्टि होने के बाद भी विस्थापन प्रक्रिया पूरी तरह आगे नहीं बढ़ सकी है। कई परिवार अपने मूल क्षेत्र के आसपास ही सुरक्षित आवास की मांग कर रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि अंतिम निर्णय भूगर्भीय रिपोर्ट और स्थानीय सहमति के आधार पर लिया जाएगा।
नैनीताल जिले में नदी किनारे बसे कुछ गांवों पर लगातार खतरा बना हुआ है। यहां कई स्थानों पर कागजी कार्रवाई पूरी हो चुकी है, लेकिन जमीनी स्तर पर विस्थापन कार्य अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के दौरान इन क्षेत्रों में जोखिम और बढ़ सकता है।
बाढ़ और भूस्खलन से बढ़ रही चिंता
देहरादून और ऊधमसिंह नगर जैसे जिलों में भी मौसम आधारित खतरे बढ़ रहे हैं। कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन की आशंका बनी हुई है, जबकि तराई क्षेत्र में बाढ़ प्रभावित गांवों की संख्या लगातार बढ़ रही है। प्रशासन अवैध निर्माण और अनियोजित विकास को भी जोखिम बढ़ने की एक बड़ी वजह मान रहा है।
राज्य सरकार का कहना है कि संवेदनशील गांवों के लिए दीर्घकालिक योजना तैयार की जा रही है, ताकि भविष्य में आपदा के खतरे को कम किया जा सके और प्रभावित परिवारों को स्थायी समाधान मिल सके।