Acid Attack Law: तेजाब हमलावरों के लिए कठोर कानून और संपत्ति जब्ती का सुझाव
Acid Attack Law: देश में तेजाब हमलों की बढ़ती गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बेहद तल्ख रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को स्पष्ट रूप से सुझाव दिया है कि ऐसे जघन्य अपराधों से निपटने के लिए मौजूदा विधायी ढांचे में बदलाव की तत्काल आवश्यकता है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि तेजाब फेंकने जैसी बर्बरता को रोकने के लिए ‘असाधारण’ दंडात्मक उपायों का सहारा लेना होगा। अदालत का मानना है कि इन मामलों में कानून की सख्ती ऐसी होनी चाहिए जैसी दहेज हत्या के मामलों में होती है, जहाँ आरोपी को खुद को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है।

अपराधियों में कानून का खौफ पैदा करना जरूरी
सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्यों न ऐसे मामलों में दोषियों की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान किया जाए। पीठ ने तर्क दिया कि जब तक अपराधी को दी जाने वाली सजा उसके लिए शारीरिक और आर्थिक रूप से ‘पीड़ादायक’ नहीं होगी, तब तक ऐसे जघन्य अपराधों पर लगाम कसना मुश्किल है। प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि तेजाब हमलों के मामलों में ‘सुधारात्मक दंड’ यानी अपराधी को सुधारने का मौका देने वाली सोच की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे से कहा कि सरकार को ऐसे अपराधों को दहेज हत्या की श्रेणी के समान गंभीर मानते हुए विधायी हस्तक्षेप करना चाहिए।
राज्यों से मांगी गई पीड़ितों की विस्तृत रिपोर्ट
सर्वोच्च न्यायालय ने केवल सजा पर ही बात नहीं की, बल्कि पीड़ितों के पुनर्वास और न्याय की स्थिति पर भी कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार सप्ताह का समय देते हुए एक व्यापक डेटाबेस पेश करने का निर्देश दिया है। इसमें साल-दर-साल दर्ज हुए मामलों की संख्या, अदालतों में उनकी वर्तमान स्थिति, और पीड़ितों की मदद के लिए उठाए गए कदमों का पूरा ब्योरा मांगा गया है। पीठ ने विशेष रूप से उन मामलों की जानकारी मांगी है जहाँ पीड़ितों को जबरन तेजाब पिलाया गया, जिससे उनके शरीर के अंदरूनी हिस्सों को जानलेवा नुकसान पहुँचा।
शाहीन मलिक की याचिका और व्यवस्था पर सवाल
यह पूरी कानूनी प्रक्रिया हरियाणा की शाहीन मलिक द्वारा दायर एक जनहित याचिका के बाद शुरू हुई है। शाहीन खुद एक एसिड अटैक सर्वाइवर हैं और उन्होंने अदालत के सामने व्यवस्था की कमियों को उजागर किया। याचिका में मांग की गई है कि दिव्यांगता की परिभाषा का विस्तार किया जाए ताकि आंतरिक अंगों की क्षति झेलने वाले पीड़ितों को भी बेहतर चिकित्सा देखभाल और उचित मुआवजा मिल सके। शाहीन ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी जिंदगी के 16 महत्वपूर्ण वर्ष कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने में गँवा दिए, लेकिन दुखद यह है कि निचली अदालत ने उनके हमलावरों को बरी कर दिया।
त्वरित न्याय और पुनर्वास पर जोर
पीठ ने शाहीन मलिक की स्थिति पर सहानुभूति व्यक्त करते हुए उन्हें कानूनी सहायता और उनकी पसंद के बेहतरीन वकील मुहैया कराने का प्रस्ताव दिया। साथ ही, दिल्ली उच्च न्यायालय से उनकी अपील पर जल्द सुनवाई करने का भी आग्रह किया गया। अदालत ने राज्यों से यह भी पूछा है कि क्या पीड़ितों की शैक्षणिक योग्यता और उनकी वैवाहिक या रोजगार की स्थिति को देखते हुए कोई विशेष पुनर्वास योजना बनाई गई है? अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तेजाब हमले के शिकार व्यक्ति केवल समाज के भरोसे न रहें, बल्कि उन्हें राज्य की ओर से पर्याप्त आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा मिले।
सजा को और अधिक कड़ा बनाने की पहल
न्यायालय के निर्देशों से यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में तेजाब हमलों से जुड़े कानूनों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। पीठ ने जोर देकर कहा कि निवारक उपाय तभी सफल होंगे जब कानून का डर संभावित अपराधियों के मन में बैठेगा। संपत्ति जब्ती और आरोपी पर ही सबूत का बोझ डालने जैसे सुझाव इसी दिशा में एक बड़ा कदम हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सभी उच्च न्यायालयों से लंबित मामलों की रिपोर्ट मांग ली है, जिससे यह साफ है कि न्यायपालिका अब इन मामलों में किसी भी तरह की देरी या ढिलाई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।



