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Stray Dog Bites Liability Law: स्ट्रीट डॉग्स के हमले पर सुप्रीम कोर्ट का तीखा प्रहार, अब कुत्तों को खिलाने वाले और नगर निगम भरेंगे भारी जुर्माना…

Stray Dog Bites Liability Law: भारत की शीर्ष अदालत ने लावारिस कुत्तों के बढ़ते हमलों और उनसे होने वाली मौतों पर बेहद सख्त टिप्पणी की है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सड़कों पर घूमने वाले कुत्तों के हमले से यदि किसी नागरिक को नुकसान पहुँचता है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी नगर निगम और उन लोगों पर तय की जाएगी जो उन्हें खाना खिलाते हैं। अदालत ने (Public safety from animals) के मुद्दे को सर्वोपरि मानते हुए कहा कि जानवरों के प्रति प्रेम दिखाने वालों को अब उनके व्यवहार की जवाबदेही भी लेनी होगी। जस्टिस विक्रम नाथ और उनकी पीठ ने इस बात पर नाराजगी जताई कि पिछले पांच वर्षों से नियम केवल कागजों तक ही सीमित रह गए हैं।

Stray Dog Bites Liability Law
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बेजुबानों से प्यार है तो उन्हें घर ले जाइए

सुनवाई के दौरान अदालत ने उन लोगों को सीधे निशाने पर लिया जो सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खाना तो खिलाते हैं, लेकिन उनकी जिम्मेदारी नहीं लेते। जस्टिस मेहता ने बेहद तल्ख अंदाज में सवाल किया कि अगर आपको इन जानवरों से इतना ही लगाव है, तो आप इन्हें अपने घर क्यों नहीं ले जाते? अदालत का मानना है कि (Animal feeding responsibility) केवल भोजन देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि कोई कुत्ता किसी मासूम बच्चे या राहगीर पर हमला करता है, तो उसे संरक्षण देने वाले संगठन या व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। कोर्ट ने साफ कहा कि सड़क पर जानवरों का कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

भारी मुआवजे की चेतावनी और प्रशासन की विफलता

सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को कड़ी चेतावनी दी है कि वे अब भारी मुआवजा देने के लिए तैयार रहें। अदालत ने कहा कि नगर निकाय और राज्य प्रशासन पिछले कई सालों से (Animal birth control rules) को जमीनी स्तर पर लागू करने में पूरी तरह विफल रहे हैं। इसी विफलता के कारण आज आम आदमी का सड़क पर चलना दूभर हो गया है। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि जब संस्थाएं अपनी ड्यूटी निभाने में फेल हो जाती हैं, तो न्यायालय को पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के लिए सख्त आर्थिक दंड लगाने जैसे कदम उठाने पड़ते हैं।

लाइसेंस लीजिए और कानून का पालन कीजिए

जस्टिस मेहता ने इस दौरान पालतू जानवरों के स्वामित्व को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि किसी को जानवरों का शौक है, तो उसे बाकायदा लाइसेंस लेना चाहिए और उन्हें अपने निजी दायरे में रखना चाहिए। जब कोई (Stray dog attack victims) सड़क पर लहूलुहान होता है, तो वह किसी के कब्जे में नहीं होता, जिससे जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों को असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता। लाइसेंस प्रक्रिया और नियमों का पालन न करना अब संबंधित अधिकारियों और नागरिकों के लिए महंगा साबित होने वाला है।

सार्वजनिक स्थानों से कुत्तों को हटाने का सख्त आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के नगर निकायों को एक बार फिर याद दिलाया कि उन्हें बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और अस्पतालों जैसे सार्वजनिक परिसरों को सुरक्षित करना होगा। अदालत ने पहले ही आदेश दिया था कि इन जगहों से (Sterilization and vaccination drive) के नाम पर कुत्तों को पकड़ा जाए, लेकिन उन्हें वापस उसी भीड़भाड़ वाले इलाके में न छोड़ा जाए। यह सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि बीमार या हिंसक कुत्ते सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि उसके पुराने आदेशों की लगातार अनदेखी की जा रही है।

भावनाओं से ऊपर है इंसान की जान

जब वरिष्ठ अधिवक्ता ने इस मुद्दे को भावनात्मक बताया, तो जस्टिस मेहता ने दो टूक शब्दों में कहा कि अब तक भावनाएं केवल कुत्तों के प्रति ही दिखाई गई हैं। पीड़ित बच्चों और वृद्धों के प्रति संवेदनाएं कहां हैं? अदालत ने कहा कि संसदीय बहस में भाग लेने वाले लोग जमीनी हकीकत से दूर हो सकते हैं, लेकिन (Human rights versus animal rights) की बहस में इंसान की जान की कीमत सबसे अधिक है। शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कानून और व्यवस्था का प्रभावी पालन ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है, न कि केवल कागजी सहानुभूति।

सक्षम अधिकारियों की सुस्ती पर कोर्ट की फटकार

कोर्ट ने पिछली सुनवाई के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि यह बेहद चिंताजनक है कि सक्षम प्राधिकारी अभी भी सो रहे हैं। अदालत के सात नवंबर के आदेश के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है। (Legal enforcement on stray dogs) की कमी के कारण ही कुत्तों के हमलों की घटनाएं हर दिन अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। पीठ ने निर्देश दिया कि अब इस मामले की निगरानी और भी सख्ती से की जाएगी और आदेश की अवहेलना करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई करने में कोर्ट संकोच नहीं करेगा।

पीड़ित और पशु प्रेमियों के अपने-अपने तर्क

सुनवाई के दौरान कामना पांडेय ने अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने उस कुत्ते को गोद लिया जिसने उन्हें काटा था, जिसके बाद उसने कभी किसी पर हमला नहीं किया। उन्होंने दलील दी कि (Animal cruelty prevention) की कमी और क्रूरता के कारण कुत्ते हिंसक हो जाते हैं। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को व्यक्तिगत अनुभव तक सीमित रखते हुए व्यापक स्तर पर जनसुरक्षा को प्राथमिकता दी। कोर्ट ने माना कि व्यक्तिगत उदाहरण पूरी व्यवस्था की खामियों को नहीं ढक सकते और नीतिगत स्तर पर कड़े फैसले लेना अब अनिवार्य हो गया है।

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