Article 224A – इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांच सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अस्थायी नियुक्ति की सिफारिश
Article 224A – देश की न्यायिक व्यवस्था में बढ़ते मुकदमों के दबाव के बीच सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने एक असाधारण लेकिन आवश्यक कदम उठाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लिए पांच सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को अस्थायी (एड-हॉक) न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की है। यह पहल संविधान के अनुच्छेद 224A के तहत की गई है, जिसका उद्देश्य अदालतों में न्यायाधीशों की कमी और मामलों की बढ़ती लंबित संख्या के बीच संतुलन बनाना है। प्रस्ताव के अनुसार, ये न्यायाधीश दो वर्षों तक हाईकोर्ट में कार्य करेंगे और लंबित मामलों के निपटारे में सहयोग देंगे। यह चौथा अवसर है जब 2021 के बाद से इस संवैधानिक प्रावधान का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ को दर्शाता है।

कॉलेजियम की सिफारिश और प्रक्रिया
कॉलेजियम ने जिन पांच नामों को मंजूरी दी है, उनमें जस्टिस मोहम्मद फैज आलम खान (वर्तमान में NCLAT में न्यायिक सदस्य), जस्टिस मोहम्मद असलम, जस्टिस सैयद आफताब हुसैन रिजवी, जस्टिस रेणु अग्रवाल और जस्टिस ज्योत्स्ना शर्मा शामिल हैं। प्रस्ताव में कहा गया है कि ये न्यायाधीश इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंचों में बैठकर नियमित न्यायिक कार्य करेंगे। नियुक्ति की औपचारिक प्रक्रिया राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति के बाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा पूरी की जाएगी, जैसा कि अनुच्छेद 224A में निर्धारित है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि अनुभवी न्यायाधीश अपनी विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए न्यायिक प्रणाली को अस्थायी रूप से मजबूती दे सकें।
बढ़ती पेंडेंसी और न्यायाधीशों की कमी
इलाहाबाद उच्च न्यायालय देश का सबसे बड़ा हाईकोर्ट है, जहां न्यायाधीशों के 160 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 110 न्यायाधीश ही कार्यरत हैं। इस अंतर के कारण हजारों मामले वर्षों से लंबित पड़े हैं और न्याय पाने की प्रक्रिया धीमी हो गई है। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी और दिसंबर 2025 में एड-हॉक न्यायाधीशों से जुड़े दिशा-निर्देशों में संशोधन किया, ताकि आपराधिक और दीवानी दोनों तरह के मामलों के निपटारे में तेजी लाई जा सके। हालांकि नियमित नियुक्तियों की प्रक्रिया भी चल रही है, लेकिन मौजूदा रिक्तियों को देखते हुए यह कदम तत्काल राहत देने के लिए जरूरी माना गया है।
न्यायिक सुधार की दिशा में अहम कदम
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल अस्थायी समाधान नहीं, बल्कि न्यायिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। अनुभवी न्यायाधीशों की वापसी से न सिर्फ लंबित मामलों की संख्या घटेगी, बल्कि निर्णयों की गुणवत्ता भी बेहतर होगी। आम लोगों के लिए इसका मतलब होगा तेजी से न्याय मिलना और अदालतों पर भरोसा बढ़ना। साथ ही, यह निर्णय अन्य उच्च न्यायालयों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है, जहां न्यायाधीशों की कमी और पेंडेंसी गंभीर समस्या बनी हुई है।



